क़िस्सा आदम (अलै.) व इब्लीस (सूरह आराफ़ की आयात 11 से 25 तक की रोशनी में)
आयत 11
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“और हमने
तुम्हें तख़्लीक़ किया, फिर तुम्हारी तस्वीर कशी की, फिर हमने कहा फ़रिश्तों से कि
झुक जाओ आदम के सामने”
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وَلَقَدْ
خَلَقْنٰكُمْ ثُمَّ صَوَّرْنٰكُمْ ثُمَّ قُلْنَا لِلْمَلٰۗىِٕكَةِ اسْجُدُوْا
لِاٰدَمَ ڰ
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नज़रिया-ए-इरतक़ाअ
(Evolution Theory) के हामी इस आयत से भी किसी हद तक अपनी नज़रियाती ग़िज़ा हासिल करने
की कोशिश करते हैं। क़ुरान हकीम में इंसान की तख़्लीक़ के मुख़्तलिफ़ मराहिल के बारे
में मुख़्तलिफ़ नौईयत की तफ़सीलात मिलती हैं। एक तरफ़ तो इंसान को मिट्टी से पैदा करने
की बात की गई है। मसलन सूरह आले इमरान आयत 59 में बताया गया है कि इंसाने अव्वल को
मिट्टी से बना कर ‘कुन’ कहा गया तो वह एक ज़िन्दा इंसान बन गया (फ़-यकून)। यानि यह आयत
एक तरह से इंसान की एक ख़ास मख़्लूक़ के तौर पर तख़्लीक़ की ताईद करती है। जबकि आयत
ज़ेरे नज़र में इस ज़िमन में तदरीजी मराहिल (step by step process) का ज़िक्र हुआ है।
यहाँ जमा के सीगे { وَلَقَدْ خَلَقْنٰكُمْ ثُمَّ صَوَّرْنٰكُمْ } से यूँ मालूम होता है कि जैसे इस सिलसिले की कुछ अन्वाअ (species)
पहले पैदा की गई थीं। गोया नस्ले इंसानी पहले पैदा की गई, फिर उनकी शक्ल व सूरत को
फिनिशिंग टच दिये गये। यहाँ यह सवाल पैदा होता है कि आदम तो एक था, फिर यह जमा के सीगे
क्यों इस्तेमाल हो रहे हैं? इस सवाल के जवाब के लिये सूरह आले इमरान की आयत 33 भी एक
तरह से हमें दावते ग़ौरो फ़िक्र देती है, जिसमें फ़रमाया गया है कि हज़रत आदम अलै.
को भी अल्लाह तआला ने चुना था: {اِنَّ اللّٰهَ اصْطَفٰٓي اٰدَمَ
وَنُوْحًا وَّاٰلَ اِبْرٰهِيْمَ وَاٰلَ عِمْرٰنَ عَلَي الْعٰلَمِيْنَ}। गोया यह आयत भी किसी हद तक इरतक़ाई अमल की तरफ़ इशारा करती हुई महसूस
होती है। बहरहाल इस क़िस्म की theories के बारे में जैसे-जैसे जो-जो अमली इशारे दस्तयाब
हों उनको अच्छी तरह समझने की कोशिश करनी चाहिये और आने वाले वक़्त के लिये अपने
options खुले रखने चाहिये। हो सकता है जब वक़्त के साथ-साथ कुछ मज़ीद हक़ाइक अल्लाह
तआला की हिकमत और मशीयत से इंसानी इल्म में आयें तो इन आयतों के मफ़ाहीम ज़्यादा वाज़ेह
होकर सामने आ जाएँ।
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“तो सज्दा
किया सबने सिवाय इब्लीस के, ना हुआ वह सज्दा करने वालों में।”
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فَسَجَدُوْٓا
اِلَّآ اِبْلِيْسَ ۭ لَمْ يَكُنْ مِّنَ السّٰجِدِيْنَ 11
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आयत 12
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“(अल्लाह
तआला ने) फ़रमाया किस चीज़ ने तुम्हें रोका कि तुमने सज्दा नहीं किया, जबकि मैंने
तुम्हें हुक्म दिया था।”
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قَالَ
مَا مَنَعَكَ اَلَّا تَسْجُدَ اِذْ اَمَرْتُكَ
ۭ
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“उसने
कहा मैं इससे बेहतर हूँ, मुझे तूने बनाया है आग से और इसको बनाया है मिट्टी से।”
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قَالَ
اَنَا خَيْرٌ مِّنْهُ ۚ خَلَقْتَنِيْ
مِنْ نَّارٍ وَّخَلَقْتَهٗ مِنْ طِيْنٍ
12
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उसने अपने
इस्तकबार (तकब्बुर) की बुनियाद पर ऐसा कहा। यहाँ उसका जो क़ौल नक़ल किया गया है उसके
एक एक लफ़्ज से तकब्बुर झलकता है।
आयत 13
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“(अल्लाह
तआला ने) फ़रमाया पस उतर जाओ इससे, तुम्हें यह हक़ नहीं था कि तुम इसमें तकब्बुर
करो, पस निकल जाओ, यक़ीनन तुम ज़लील व ख़्वार हो।”
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قَالَ
فَاهْبِطْ مِنْهَا فَمَا يَكُوْنُ لَكَ اَنْ تَتَكَبَّرَ فِيْهَا فَاخْرُجْ
اِنَّكَ مِنَ الصّٰغِرِيْنَ 13
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आयत 14
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“उसने
कहा (ऐ अल्लाह) मुझे मोहलत दे उस दिन तक जिस दिन इन्हें (ज़िन्दा करके) उठाया जायेगा।”
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قَالَ اَنْظِرْنِيْٓ اِلٰي يَوْمِ
يُبْعَثُوْنَ 14
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आयत 15
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“फ़रमाया
(ठीक है जाओ) तुम्हें मोहलत दी गई।”
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قَالَ
اِنَّكَ مِنَ الْمُنْظَرِيْنَ 15
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आयत 16
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“उसने
कहा (परवरदिग़ार!) तूने जो मुझे (आदम की वजह से) गुमराह किया है तो अब मैं लाज़िमन
उनके लिये घात में बैठूँगा तेरी सीधी राह पर।”
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قَالَ
فَبِمَآ اَغْوَيْتَنِيْ لَاَقْعُدَنَّ لَهُمْ صِرَاطَكَ الْمُسْتَقِيْمَ 16ۙ
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तेरी तौहीद
की शाहराह पर डेरे जमा कर, घात लगा कर, मोर्चाबंद होकर बैठूँगा और तेरे बंदों को शिर्क
की पगडँडियों की तरफ़ मोड़ता रहूँगा।
आयत 17
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“फिर
मैं उन पर हमला करुँगा उनके सामने से और उनके पीछे से, उनके दाएँ और बाएँ जानिब से,
और तू नहीं पायेगा उनकी अक्सरियत को शुक्र करने वाला।”
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ثُمَّ لَاٰتِيَنَّهُمْ مِّنْۢ بَيْنِ
اَيْدِيْهِمْ وَمِنْ خَلْفِهِمْ وَعَنْ اَيْمَانِهِمْ وَعَنْ شَمَاۗىِٕلِهِمْ ۭ
وَلَا تَجِدُ اَكْثَرَهُمْ شٰكِرِيْنَ
17
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आयत 18
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“(अल्लाह
तआला ने) फ़रमाया निकल जाओ इसमें से बुरे हाल में मरदूद होकर। उनमें से जो तेरी पैरवी
करेंगे तो मैं (उन्हें और तुम्हें इकट्ठा करके) तुम सबसे जहन्नम को भर कर रहूँगा।”
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قَالَ اخْرُجْ مِنْهَا مَذْءُوْمًا
مَّدْحُوْرًا ۭ لَمَنْ تَبِعَكَ
مِنْهُمْ لَاَمْلَئَنَّ جَهَنَّمَ مِنْكُمْ اَجْمَعِيْنَ 18
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आयत 19
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“और (फिर
हमने आदम से कहा कि) ऐ आदम अलै. रहो जन्नत में तुम और तुम्हारी बीवी, और खाओ-पियो
इसमें से जहाँ से तुम दोनों चाहो, (हाँ) उस दरख़्त के क़रीब मत जाना, वरना तुम ज़ालिमों
में से हो जाओगे।”
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وَيٰٓاٰدَمُ اسْكُنْ اَنْتَ
وَزَوْجُكَ الْجَنَّةَ فَكُلَا مِنْ حَيْثُ شِـئْتُمَا وَلَا تَقْرَبَا هٰذِهِ
الشَّجَرَةَ فَتَكُوْنَا مِنَ الظّٰلِمِيْنَ
19
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आयत 20
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“तो शैतान
ने उन दोनों को वसवसे में डाला ताकि ज़ाहिर कर दे उन पर जो उनसे पोशीदा थीं उनके
शर्मगाहें”
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فَوَسْوَسَ
لَهُمَا الشَّيْطٰنُ لِيُبْدِيَ لَهُمَا مَا وٗرِيَ عَنْهُمَا مِنْ سَوْاٰتِهِمَا
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क़िस्सा
आदम अलै. व इब्लीस की तफ़सील हम सूरतुल बक़रह के चौथे रुकूअ में भी पढ़ चुके हैं। यहाँ
यह क़िस्सा दूसरी मरतबा बयान हुआ है। पूरे क़ुरान मजीद में यह वाक़्या सात मरतबा आया
है, छ: मरतबा मक्की सूरतों में और एक मरतबा मदनी सूरत (अल् बक़रह) में। लेकिन हर जगह
मुख़्तलिफ़ अंदाज़ से बयान हुआ है और हर बार किसी ना किसी नई बात का इसमें इज़ाफ़ा
हुआ है। हुज़ूर ﷺ की दावती तहरीक जैसे-जैसे आगे बढ़ रही थी, हर
दौर के मख़्सूस हालात के सबब इस वाक़िये में हर दफ़ा मज़ीद तफ़सीलात शामिल होती गईं।
इस रुकूअ के शुरू में जब इस क़िस्से का ज़िक्र आया है तो वहाँ जमा का सीगा इस्तेमाल
करके तमाम इंसानों को मुख़ातिब किया गया है: {وَلَقَدْ
خَلَقْنٰكُمْ ثُمَّ صَوَّرْنٰكُمْ ثُمَّ قُلْنَا لِلْمَلٰۗىِٕكَةِ اسْجُدُوْا
لِاٰدَمَ ڰ فَسَجَدُوْٓا اِلَّآ اِبْلِيْسَ ۭ}
सूरतुल बक़रह की मुतल्लक़ा आयतों की
वज़ाहत करते हुए इस ज़िमन में बाज़ अहम निकात ज़ेरे बहस आ चुके हैं। यहाँ मज़ीद कुछ
बातें तशरीह तलब हैं। एक तो शैतान के हज़रत आदम और हज़रत हव्वा अलै. को वरगलाने और
उनके दिलों में वसवसे डालने का सवाल है कि उसकी कैफ़ियत क्या थी। इस सिलसिले में जो
बातें और मकालमात (discussions) क़ुरान में आये हैं उनसे यह गुमान हरग़िज़ ना किया
जाये कि वह इसी तरह उनके दरमियान वक़ूअ पज़ीर भी हुए थे और वह एक-दूसरे को देखते और
पहचानते हुए एक-दूसरे से बातें करते थे। ऐसा हरग़िज़ नहीं था, बल्कि शैतान जैसे आज
हमारी निगाहों से पोशीदा है इसी तरह हज़रत आदम अलै. और हज़रत हव्वा अलै. की नज़रों
से भी पोशीदा था और जिस तरह आज हमारे दिलों में शैतानी वसवसे जन्म लेते हैं इसी तरह
उनके दिलों में भी वसवसे पैदा हुए थे। दूसरा अहम नुक्ता एक ख़ास ममनुआ (मना किया) फल
के चखने और उसकी एक ख़ास तासीर के बारे में है। क़ुरान मजीद में हमें इसकी तफ़सील इस
तरह मिलती है कि उस फल के चखने पर उनकी शर्मगाहें नुमाया हो गईं। जहाँ तक इस कैफ़ियत
की हक़ीक़त का ताल्लुक़ है तो इसे मालूम करने के लिये हमारे पास हत्मी और क़तई
इल्मी ज़राए नहीं हैं, इसलिये इसे मुतशाबेहात में ही शुमार किया जायेगा। अलबत्ता इसके
बारे में मुफ़स्सरीन ने क़यास आराइयाँ की हैं। मसलन यह कि उन्हें अपने इन आज़ा (body
parts) के बारे में शऊर नहीं था, मग़र वह फल चखने के बाद यह शऊर उनमें बेदार हो गया,
या यह कि पहले उन्हें जन्नत का लिबास दिया गया था जो इस वाक़िये के बाद उतर गया। बाज़
लोगों के नज़दीक यह नेकी और बदी का दरख़्त था जिसका फल खाते ही उनमें नेकी और बदी की
तमीज़ पैदा हो गई। बाज़ हज़रात का ख़्याल है कि यह दरअसल आदम अलै. और हव्वा अलै.
के दरमियान पहला जिन्सी इख़तलात (sexual act) था, जिसे इस अंदाज़ में बयान किया गया
है। यह मुख़्तलिफ़ आरा (opinions) हैं, लेकिन सही बात यही है कि यह मुतशाबेहात में
से हैं और ठोस इल्मी मालूमात के बग़ैर इसके बारे में कोई क़तई और हक़ीकी राय क़ायम
करने की कोशिश नहीं करनी चाहिये कि वह दरख़्त कौनसा था और उसे चखने की असल हक़ीक़त
और कैफ़ियत क्या थी।
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“और उसने
कहा (वसवसा अंदाज़ी की) कि नहीं रोका है आप दोनों को आपके रब ने इस दरख़्त से म़गर
इसलिये कि कहीं आप फ़रिश्ते ना बन जायें या कहीं हमेशा-हमेशा रहने वाले ना बन जायें।”
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وَقَالَ
مَا نَهٰىكُمَا رَبُّكُمَا عَنْ هٰذِهِ الشَّجَرَةِ اِلَّآ اَنْ تَكُوْنَا
مَلَكَيْنِ اَوْ تَكُوْنَا مِنَ الْخٰلِدِيْنَ 20
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यह तो सीधी
सी बात है कि फ़रिश्तों को तो आदम अलै. के सामने झुकाया गया था तो इसके बाद आप अलै.
के लिये फ़रिश्ता बन जाना कौनसी बड़ी बात थी, लेकिन बाज़ अवक़ात यूँ भी होता है कि
इंसान को निस्यान हो जाता है और वह अपनी असल हक़ीक़त, असल मक़ाम को भूल जाता है, चुनाँचे
यह बात गोया शैतान ने वसवसे के अंदाज़ से उनके ज़हनों में डालने की कोशिश की कि इस
शजर-ए-ममनुआ (Probihited Tree) का फ़ल खाकर तुम फ़रिश्ते बन जाओगे या हमेशा-हमेशा ज़िन्दा
रहोगे और तुम पर मौत तारी ना होगी।
आयत 21
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“और उसने
क़समें खा-खा कर उनको यक़ीन दिलाया कि मैं आप दोनों के लिये बहुत ही ख़ैरख़्वाह हूँ।”
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وَقَاسَمَهُمَآ
اِنِّىْ لَكُمَا لَمِنَ النّٰصِحِيْنَ
21ۙ
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आयत 22
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“तो उसने
धोखा देकर उन्हें माइल (राज़ी) कर ही लिया।”
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فَدَلّٰىهُمَا
بِغُرُوْرٍ ۚ
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“तो जब
उन दोनों ने चख लिया उस दरख़्त के फल को तो ज़ाहिर हो गईं उन पर उनकी शर्मगाहें और
वह लगे गाँठने जन्नत के (दरख़्तों के) पत्तों को अपने ऊपर (लिबास बनाने के लिये)”
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فَلَمَّا
ذَاقَا الشَّجَرَةَ بَدَتْ لَهُمَا سَوْاٰتُهُمَا وَطَفِقَا يَخْصِفٰنِ
عَلَيْهِمَا مِنْ وَّرَقِ الْجَنَّةِ ۭ
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अपनी उरयानी
का अहसास होने के बाद वह जन्नत के दरख़्तों के पत्तों को आपस में सी कर या जोड़ कर
अपने-अपने सतर को छुपाने का अहतमाम करने लगे।
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“और अब
आवाज़ दी उन दोनों को उनके रब ने कि क्या मैंने तुम्हें मना नहीं किया था उस दरख़्त
से और क्या मैंने तुमसे कहा नहीं था कि शैतान तुम दोनों का खुला दुश्मन है।”
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وَنَادٰىهُمَا
رَبُّهُمَآ اَلَمْ اَنْهَكُمَا عَنْ تِلْكُمَا الشَّجَرَةِ وَاَقُلْ لَّكُمَآ
اِنَّ الشَّيْطٰنَ لَكُمَا عَدُوٌّ مُّبِيْنٌ
22
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आयत 23
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“(इस
पर) वह दोनों पुकार उठे कि ऐ हमारे रब हमने ज़ुल्म किया अपनी जानों पर, और अग़र तूने
हमें माफ़ ना फ़रमाया और हम पर रहम ना फ़रमाया तो हम तबाह होने वालों में से हो जायेंगे।”
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قَالَا
رَبَّنَا ظَلَمْنَآ اَنْفُسَنَا ۫وَاِنْ
لَّمْ تَغْفِرْ لَنَا وَتَرْحَمْنَا لَنَكُوْنَنَّ مِنَ الْخٰسِرِيْنَ 23
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यानि हम
अपनी ग़लती का ऐतराफ़ (स्वीकार) करते हैं कि हमने अपनी जानों पर ज़्यादती की है। यह
वही कलिमात हैं जिनके बारे में हम सूरतुल बक़रह (आयत:37) में पढ़ आये हैं: {فَتَلَـقّيٰٓ
اٰدَمُ مِنْ رَّبِّهٖ كَلِمٰتٍ فَتَابَ عَلَيْهِ} यानि आदम
अलै. ने अपने रब से कुछ कलिमात सीख लिये और उनके ज़रिये से माफ़ी माँगी तो अल्लाह ने
उसकी तौबा क़ुबूल कर ली। वहाँ इस ज़िमन में सिर्फ़ इशारा किया गया था, यहाँ वह कलिमात
बता दिये गये हैं। इस सारे वाक़िये में एक बात यह भी क़ाबिले ग़ौर है कि क़ुरान में
कहीं भी कोई ऐसा इशारा नहीं मिलता जिससे यह साबित हो कि इब्लीस ने यह वसवसा इब्तदा
में अम्मा हव्वा के दिल में डाला था। इस सिलसिले में आमतौर पर हमारे यहाँ जो कहानियाँ
मौजूद हैं उनकी रू से शैतान के बहकावे में पहले हज़रत हव्वा आयीं और फिर वह हज़रत आदम
अलै. को गुमराह करने का ज़रिया बनी। लेकिन क़ुरान इस इम्कान की नफ़ी करता है। आयत ज़ेरेनज़र
के मुताअले से तो उन दोनों का बहकावे में आ जाना बिल्कुल वाज़ेह हो जाता है क्योंकि
यहाँ क़ुरान मुसलसल तसनिया का सीगा (द्विवचन) इस्तेमाल कर रहा है यानि शैतान ने उन
दोनों को वरग़लाया, दोनो उसके बहकावे में आ गये फिर दोनों ने अल्लाह से माफ़ी माँगी
और अल्लाह ने दोनों को माफ़ कर दिया।
हज़रत हव्वा अलै. के शैतान के बहकावे
में आने वाली कहानियों की तरवीज दरअसल ईसाइयत के ज़ेरे असर हुई है। ईसाइयत में औरत
को गुनाह और बुराई की जड़ समझा जाता है यही वजह है कि Eve (हव्वा) से लफ़्ज़ evil उनके
यहाँ बुराई का हम मायने क़रार पाया है। ईसाइयत में शादी करना और औरत से क़ुरबत का ताल्लुक़
एक घटिया फ़अल (काम) तसव्वुर किया जाता था, जबकि तज्जरुद (अविवाहित) की ज़िन्दगी गुज़ारना
और रहबानियत के तौर तरीक़ों को उनके यहाँ रुहानियत की मैराज समझा जाता था। नतीजतन उनके
यहाँ इस तरह की कहानियों ने जन्म लिया, जिनसे साबित होता है कि आदम अलै. को जन्नत से
निकलवाने और उनकी आज़माईशों और मुसीबतों का बाइस बनने वाली दरअसल एक औरत थी। बहरहाल
ऐसे तसव्वुरात और नज़रियात की ताईद क़ुरान मजीद से नहीं होती।
आयत 24
|
“(अल्लाह
ने) फ़रमाया तुम सब उतर जाओ (अब) तुम एक-दूसरे के दुश्मन हो।”
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قَالَ
اهْبِطُوْا بَعْضُكُمْ لِبَعْضٍ عَدُوٌّ ۚ
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हुबूत के
बारे में सूरतुल बक़रह आयत 36 में वज़ाहत हो चुकी है कि यह लफ़्ज़ सिर्फ़ बुलंदी से
नीचे उतरने के मायने के लिये ही ख़ास नहीं बल्कि एक जगह से दूसरी जगह मुन्तक़िल होने
का मफ़हूम भी इसमें शामिल है। जिस दुश्मनी का ज़िक्र यहाँ किया गया वह हज़रत आदम के
हुबूते अरज़ी के वक़्त से आज तक शैतान की ज़ुर्रियत और आदम की औलाद के दरमियान मुसलसल
चली आ रही है और क़यामत तक चलती रहेगी। इसके अलावा इससे बनी नौए इंसानी की बाहमी दुश्मनियाँ
भी मुराद हैं जो मुख्तलिफ़ अफ़राद और अक़वाम के दरमियान पायी जाती हैं।
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“और तुम्हारे
लिये ज़मीन में ठिकाना है और (ज़रुरत का) साज़ो सामान भी एक वक़्ते मुअय्यन तक।”
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وَلَكُمْ
فِي الْاَرْضِ مُسْتَقَرٌّ وَّمَتَاعٌ اِلٰي حِيْنٍ 24
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यह ठिकाना
और माल-ओ-मताअ अब्दी नहीं है, बल्कि एक ख़ास वक़्त तक के लिये है। अब तुम्हें इस ज़मीन
पर रहना-बसना है और यहाँ रहने-बसने के लिये जो चीज़ें ज़रूरी हैं वह यहाँ पर फ़राहम
कर दी गई हैं।
आयत 25
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“फिर
फ़रमाया कि (अब) तुम इसी (ज़मीन) में ज़िन्दगी गुज़ारोगे, इसी में मरोगे और इसी में
से तुम्हें निकाल लिया जायेगा।”
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قَالَ فِيْهَا تَحْيَوْنَ وَفِيْهَا
تَمُوْتُوْنَ وَمِنْهَا تُخْرَجُوْنَ
25ۧ
|
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