Thursday, November 2, 2017

दुनिया की असल हक़ीक़त

दुनिया की असल हक़ीक़त


وَمَا الْحَيٰوةُ الدُّنْيَآ اِلَّا لَعِبٌ وَّلَهْوٌ ۭ

“और नहीं है दुनिया की ज़िन्दगी मगर खेल और कुछ जी बहला लेना।” [Quran, 6:32]


इसका मतलब यह नहीं लेना चाहिये कि दुनिया की ज़िन्दगी की कोई हक़ीक़त नहीं है, बल्कि तक़ाबुल में ऐसा कहा जाता है कि आख़िरत के मुक़ाबले में इसकी यही हक़ीक़त है। एक शय अब्दी है, हमेशा-हमेश की है और एक शय आरज़ी और फ़ानी है। इन दोनों का आपस में क्या मुक़ाबला? जैसे दुआये इस्तखारा में अल्फ़ाज़ आये हैं: فاِنَّکَ تَعْلَمُ وَلَا اَعْلَمُ (ऐ अल्लाह! तू ही सब कुछ जानता है, मैं कुछ नहीं जानता)। इसका यह मतलब तो नहीं है कि इन्सान के पास कोई भी इल्म नहीं है, लेकिन अल्लाह के इल्म के मुक़ाबले में किसी दूसरे का इल्म कुछ ना होने के बराबर है। इसी तरह यहाँ आख़िरत के मुक़ाबले में दुनिया की ज़िन्दगी को लअब और लहव क़रार दिया गया है। वरना दुनिया तो एक ऐतबार से आख़िरत की खेती है। एक हदीस भी बयान की जाती है कि ((اَلدُّنْیَا مَزْرَعَۃُ الآخِرَۃِ))(3) “दुनिया आख़िरत की खेती है।” यहाँ बोओगे तो वहाँ काटोगे। अगर यहाँ बोओगे नहीं तो वहाँ काटोगे क्या? यह ताल्लुक़ है आपस में दुनिया और आख़िरत का। इस ऐतबार से दुनिया एक हक़ीक़त है और एक इम्तिहानी वक़्फ़ा है। लेकिन जब आप ताक़बुल करेंगे दुनिया और आख़िरत का तो दुनिया और इसका माल व मताअ आख़िरत की अबदियत और उसकी शान व शौकत के मुक़ाबले में गोया ना होने के बराबर है। दुनिया तो महज़ तीन घंटे के एक ड्रामे की मानिन्द है जिसमें किसी को बादशाह बना दिया जाता है और किसी को फ़क़ीर। जब ड्रामा ख़त्म होता है तो ना बादशाह सलामत बादशाह हैं और ना फ़क़ीर फ़क़ीर है। ड्रामा हॉल से बाहर जाकर कपड़े तब्दील किये और सब एक जैसे बन गये। यह है दुनिया की असल हक़ीक़त। चुनाँचे इस आयत में दुनिया को खेल-तमाशा क़रार दिया गया है।

Tuesday, January 24, 2017

क़यामत के दिन शफ़ाअत!

क़यामत के दिन शफ़ाअत!
हम क्या सोचते हैं, और हक़ीक़त क्या है? -_-
فَكَيْفَ اِذَا جِئْنَا مِنْ كُلِّ اُمَّةٍۢ بِشَهِيْدٍ وَّجِئْنَا بِكَ عَلٰي هٰٓؤُلَاۗءِ شَهِيْدًا 41؀ڲ
“तो उस दिन क्या सूरते हाल होगी जब हम हर उम्मत में से एक गवाह खड़ा करेंगे, और (ऐ नबी) आपको लाएँगे हम इन पर गवाह बना कर।”
नबी अकरम ﷺ क़यामत के दिन खड़े होकर कहेंगे कि ऐ अल्लाह मेरे पास जो दीन आया था मैंने इन्हें पहुँचा दिया था, अब यह अपने तर्ज़े अमल के ख़ुद ज़िम्मेदार हैं। यही बात क़यामत के दिन खड़े होकर तुम्हें कहनी है कि ऐ अल्लाह हमने अपने ज़माने के लोगों तक तेरा दीन पहुँचा दिया था, अब इसके बाद अपने तर्ज़े अमल के यह ख़ुद जवाबदेह हैं। ऐसा ना हो कि उल्टा वह हमारे ऊपर मुक़दमा करें कि ऐ अल्लाह इन बदबख्तों ने हमें तेरा दीन नहीं पहुँचाया, यह ख़जाने के साँप बन कर बैठे रहे।
हमारी अदालती इस्तलाह में इसे इस्तग़ाशा का गवाह (prosecution witness) कहा जाता है। गोया अदालत-ए-ख़ुदावंदी में नबी अकरम ﷺ इस्तग़ाशा के गवाह की हैसियत से पेश होकर कहेंगे कि ऐ अल्लाह, तेरा पैग़ाम जो मुझ तक पहुँचा था मैंने इन्हें पहुँचा दिया था, अब यह ख़ुद ज़िम्मेदार और जवाबदेह हैं। चुनाँचे अपनी ही क़ौम के ख़िलाफ़ गवाही आ गई ना? यहाँ अल्फ़ाज़ नोट कर लीजिये: عَلٰي هٰٓؤُلَاۗءِ شَهِيْدًا और عَلٰي हमेशा मुख़ालफ़त के लिये आता है। हम तो हाथ पर हाथ धरे शफ़ाअत की उम्मीद में हैं और यहाँ हमारे ख़िलाफ मुक़दमा क़ायम होने चला है। अल्लाह के रसूल ﷺ दरबारे ख़ुदावंदी में हमारे ख़िलाफ़ गवाही देंगे कि ऐ अल्लाह! मैंने तेरा दीन इनके सुपुर्द किया था, अब इसे दुनिया में फैलाना इनका काम था, लेकिन इन्होंने ख़ुद दीन को छोड़ दिया। सूरतुल फ़ुरक़ान में अल्फ़ाज़ आये हैं: { وَقَالَ الرَّسُوْلُ يٰرَبِّ اِنَّ قَوْمِي اتَّخَذُوْا ھٰذَا الْقُرْاٰنَ مَهْجُوْرًا} (आयत:30) “और रसूल ﷺ कहेंगे कि परवरदिग़ार, मेरी क़ौम ने इस क़ुरान को तर्क कर दिया था।” सूरतुन्निसा की आयत ज़ेरे मुताअला के बारे में एक वाक़िया भी है। एक मर्तबा रसूल ﷺ ने हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद रज़ि० से इर्शाद फ़रमाया कि मुझे क़ुरान सुनाओ! उन्होंने अर्ज़ किया हुज़ूर आपको सुनाऊँ? आप ﷺ पर तो नाज़िल हुआ है। फ़रमाया: हाँ, लेकिन मुझे किसी दूसरे से सुन कर कुछ और हज़ (आनंद) हासिल होता है। हज़रत अब्दुल्लाह रज़ि० ने सूरतुन्निसा पढ़नी शुरू की। हुज़ूर ﷺ भी सुन रहे थे, बाक़ी और सहाबा रज़ि० भी होंगे और हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद रज़ि० गर्दन झुकाए पढ़ते जा रहे थे। जब इस आयत पर पहुँचे { فَكَيْفَ اِذَا جِئْنَا مِنْ كُلِّ اُمَّةٍۢ بِشَهِيْدٍ وَّجِئْنَا بِكَ عَلٰي هٰٓؤُلَاۗءِ شَهِيْدًا } तो हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया حَسْبُکَ، حَسْبُکَ (बस करो, बस करो!) अब्दुल्लाह बिन मसूद रज़ि० ने सर उठा कर देखा तो हुज़ूर ﷺ की आँखों में आँसू रवाँ थे। इस वजह से कि मुझे अपनी क़ौम के ख़िलाफ़ गवाही देनी होगी।