सूरह अल मायदा, आयत 68 “(ऐ नबी
ﷺ) कह दीजिये: ऐ किताब वालों
तुम किसी चीज़ पर नहीं हो, जब तक तुम
क़ायम ना करो तौरात और इन्जील को और जो कुछ नाज़िल किया गया है तुम पर तुम्हारे रब
की तरफ़ से.”
तुम्हारी कोई हैसियत नहीं है, कोई मक़ाम नहीं है, कोई जड़ बुनियाद नहीं है, तुम हमसे हमकलाम होने के मुस्तहिक़ नहीं हो.
अब अपने लिये इस
आयत को आप इस तरह पढ़ लीजिये: {} “ऐ क़ुरान के मानने वालो! तुम्हारी कोई हैसियत
नहीं---- तुम समझते हो कि हम उम्मते मुस्लिमा हैं, अल्लाह वाले हैं, अल्लाह के
लाड़ले और प्यारे हैं, अल्लाह के रसूल ﷺ के
उम्मती हैं. लेकिन तुम देख रहे हो कि ज़िल्लत व ख्वारी तुम्हारा मुक़द्दर बनी हुई
है, हर तरफ़ से तुम पर यलगार है, इज़्ज़त व वक़ार नाम की कोई शय (चीज़) तुम्हारे पास
नहीं रही. तुम कितनी ही तादाद में क्यों ना हो, दुनिया में तुम्हारी कोई हैसियत
नहीं, और इससे भी ज़्यादा बेतौक़ीरी के लिये भी तैयार रहो. “तुम्हारी कोई असल नहीं
जब तक तुम क़ायम ना करो क़ुरान को और उसके साथ जो कुछ मज़ीद तुम पर तुम्हारे रब की
तरफ़ से नाज़िल हुआ है.” क़ुरान वही-ए-जली है. इसके अलावा हुज़ूर ﷺ को वही-ए-ख़फ़ी के ज़रिये से भी तो अहकामात मिलते थे सुन्नते रसूल ﷺ वही-ए-ख़फ़ी का ज़हूर ही तो है. तो जब तक तुम किताब व सुन्नत का
निज़ाम क़ायम नहीं करते, तुम्हारी कोई हैसियत नहीं. यह भी याद रहे कि “या अहलल क़ुरान”
का ख़िताब ख़ुद हुज़ूर ﷺ ने हमें
दिया है. मेरे किताबचे “मुसलमानों पर क़ुरान मजीद के हुक़ूक़” में यह हदीस मौजूद है
जिसमें हुज़ूर ﷺ से यह अल्फ़ाज़ नक़ल हुए हैं:
“ऐ अहले क़ुरान,
क़ुरान को अपना तकिया ना बना लेना, बल्कि इसे पढ़ा करो रात के अवक़ात में भी और दिन
के अवक़ात में भी, जैसा कि इसके पढ़ने का हक़ है, और इसे आम करो और ख़ुश अलहानी से पढ़ो
और इसमें तदब्बुर करो ताकि तुम फ़लाह पाओ.”
डॉक्टर इसरार अहमद (मरहूम)
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