Thursday, October 20, 2016

और नहीं है दुनिया की ज़िन्दगी मगर खेल और कुछ जी बहला लेना.

आयत 32 “और नहीं है दुनिया की ज़िन्दगी मगर खेल और कुछ जी बहला लेना. और यक़ीनन आख़िरत का घर बेहतर है उन लोगों के लिये जो तक़वा इख़्तियार करें, तो क्या तुम अक़्ल से काम नहीं लेते?”
इसका मतलब यह नहीं लेना चाहिये कि दुनिया की ज़िन्दगी की कोई हक़ीक़त नहीं है, बल्कि तक़ाबुल में ऐसा कहा जाता है कि आख़िरत के मुक़ाबले में इसकी यही हक़ीक़त है. एक शय अब्दी है, हमेशा-हमेश की है और एक शय आरज़ी और फ़ानी है. इन दोनों का आपस में क्या मुक़ाबला? जिसे दुआये इस्तखारा में अल्फ़ाज़ आये हैं: (ऐ अल्लाह! तू ही सब कुछ जानता है, मैं कुछ नहीं जानता). इसका यह मतलब तो नहीं है कि इन्सान के पास कोई भी इल्म नहीं है, लेकिन अल्लाह के इल्म के मुक़ाबले में किसी दूसरे का इल्म कुछ ना होने के बराबर है. इसी तरह यहाँ आख़िरत के मुक़ाबले में दुनिया की ज़िन्दगी को लअब और लहव क़रार दिया गया है. वरना दुनिया तो एक ऐतबार से आख़िरत की खेती है. एक हदीस भी बयान की जाती है कि “दुनिया आख़िरत की खेती है.” यहाँ बोओगे तो वहाँ काटोगे. अगर यहाँ बोओगे नहीं तो वहाँ काटोगे क्या? यह ताल्लुक़ है आपस में दुनिया और आख़िरत का. इस ऐतबार से दुनिया एक हक़ीक़त है और एक इम्तिहानी वक़्फ़ा है. लेकिन जब आप ताक़बुल करेंगे दुनिया और आख़िरत का तो दुनिया और इसका माल व मताअ आख़िरत की अबदियत और उसकी शान व शौकत के मुक़ाबले में गोया ना होने के बराबर है. दुनिया तो महज़ तीन घंटे के एक ड्रामे की मानिन्द है जिसमें किसी को बादशाह बना दिया जाता है और किसी को फ़क़ीर. जब ड्रामा ख़त्म होता है तो ना बादशाह सलामत बादशाह हैं और ना फ़क़ीर फ़क़ीर है. ड्रामा हॉल से बाहर जाकर कपड़े तब्दील किये और सब एक जैसे बन गये. यह है दुनिया की असल हक़ीक़त. चुनाँचे इस आयत में दुनिया को खेल-तमाशा क़रार दिया गया है.
डॉक्टर इसरार अहमद बयानुल क़ुरान किताब से.
Translated from Bayanul Quran Urdu book of Dr. Israr Ahmad (RA)

Monday, October 17, 2016

शिर्क

शिर्क के बारे में यह बात वाज़ेह रहनी चाहिये कि शिर्क सिर्फ़ यही नहीं है कि कोई मूर्ति ही सामने रख कर उसको सज्दा किया जाये, बल्कि और बहुत सी बातें और बहुत से नज़रियात भी शिर्क के ज़ुमरे में आते हैं. यह एक ऐसी बीमारी है जो हर दौर में भेस बदल-बदल कर आती है, चुनाँचे इसे पहचानने के लिये बहुत वुसअत नज़री की ज़रूरत है. मसलन आज के दौर का एक बहुत बड़ा शिर्क नज़रिया-ए-वतनियत है, जिसे अल्लामा इक़बाल ने सबसे बड़ा बुत क़रार दिया है, “इन ताज़ा ख़ुदाओं में बड़ा सबसे वतन है!” यह शिर्क की वह क़िस्म है जिससे हमारे पुराने दौर के उल्मा भी वाक़िफ़ नहीं थे. इसलिये कि इस अंदाज़ में वतनियत का नज़रिया पहले दुनिया में था ही नहीं.

शिर्क के बारे में एक बहुत सख्त आयत हम दो दफ़ा सूरतुन्निसा (आयत 48 और 116) में पढ़ चुके हैं: {} “अल्लाह तआला इसे हरगिज़ माफ़ नहीं फ़रमायेगा कि उसके साथ शिर्क किया जाये, अलबत्ता इससे कमतर गुनाह जिसके लिये चाहेगा माफ़ फ़रमा देगा.” अल्लाह तआला शिर्क से कमतर गुनाहों में से जो चाहेगा, जिसके लिये चाहेगा, बगैर तौबा के भी बख्श देगा, अलबत्ता शिर्क से भी अगर इन्सान ताइब हो जाये तो यह भी माफ़ हो सकता है. 

: डॉक्टर इसरार अहमद (रहि०)

Monday, October 3, 2016

“ऐ क़ुरान के मानने वालो! तुम्हारी कोई हैसियत नहीं"

सूरह अल मायदा, आयत 68 “(ऐ नबी ) कह दीजिये: ऐ किताब वालों तुम किसी चीज़ पर नहीं हो, जब तक तुम क़ायम ना करो तौरात और इन्जील को और जो कुछ नाज़िल किया गया है तुम पर तुम्हारे रब की तरफ़ से.”
तुम्हारी कोई हैसियत नहीं है, कोई मक़ाम नहीं है, कोई जड़ बुनियाद नहीं है, तुम हमसे हमकलाम होने के मुस्तहिक़ नहीं हो. 
अब अपने लिये इस आयत को आप इस तरह पढ़ लीजिये: {} “ऐ क़ुरान के मानने वालो! तुम्हारी कोई हैसियत नहीं---- तुम समझते हो कि हम उम्मते मुस्लिमा हैं, अल्लाह वाले हैं, अल्लाह के लाड़ले और प्यारे हैं, अल्लाह के रसूल के उम्मती हैं. लेकिन तुम देख रहे हो कि ज़िल्लत व ख्वारी तुम्हारा मुक़द्दर बनी हुई है, हर तरफ़ से तुम पर यलगार है, इज़्ज़त व वक़ार नाम की कोई शय (चीज़) तुम्हारे पास नहीं रही. तुम कितनी ही तादाद में क्यों ना हो, दुनिया में तुम्हारी कोई हैसियत नहीं, और इससे भी ज़्यादा बेतौक़ीरी के लिये भी तैयार रहो. “तुम्हारी कोई असल नहीं जब तक तुम क़ायम ना करो क़ुरान को और उसके साथ जो कुछ मज़ीद तुम पर तुम्हारे रब की तरफ़ से नाज़िल हुआ है.” क़ुरान वही-ए-जली है. इसके अलावा हुज़ूर को वही-ए-ख़फ़ी के ज़रिये से भी तो अहकामात मिलते थे सुन्नते रसूल वही-ए-ख़फ़ी का ज़हूर ही तो है. तो जब तक तुम किताब व सुन्नत का निज़ाम क़ायम नहीं करते, तुम्हारी कोई हैसियत नहीं. यह भी याद रहे कि “या अहलल क़ुरान” का ख़िताब ख़ुद हुज़ूर ने हमें दिया है. मेरे किताबचे “मुसलमानों पर क़ुरान मजीद के हुक़ूक़” में यह हदीस मौजूद है जिसमें हुज़ूर से यह अल्फ़ाज़ नक़ल हुए हैं:
“ऐ अहले क़ुरान, क़ुरान को अपना तकिया ना बना लेना, बल्कि इसे पढ़ा करो रात के अवक़ात में भी और दिन के अवक़ात में भी, जैसा कि इसके पढ़ने का हक़ है, और इसे आम करो और ख़ुश अलहानी से पढ़ो और इसमें तदब्बुर करो ताकि तुम फ़लाह पाओ.”


डॉक्टर इसरार अहमद (मरहूम)