Tuesday, July 12, 2016

क़ुरान के बारे में हमारा अक़ीदा Part 1 of 2

क़ुरान के बारे में हमारा अक़ीदा

तारूफ़े क़ुरान मजीद के सिलसिले में सबसे पहली बात यह है कि क़ुरान हकीम के बारे में हमारा ईमान, या इस्तलाहे आम में हमारा अक़ीदा क्या है?
क़ुरान हकीम के मुताल्लिक़ अपना अक़ीदा हम तीन सादा जुमलों में बयान कर सकते हैं:
1) क़ुरान अल्लाह का कलाम है।
2) यह मुहम्मद रसूल अल्लाह पर नाज़िल हुआ है।
3) यह हर ऐतबार से महफ़ूज है, और कुल का कुल मन अन मौजूद है, और इसकी हिफ़ाजत का ज़िम्मा ख़ुद अल्लाह तआला ने लिया है।
यह तीन जुमले हमारे अक़ाइद की फ़ेहरिस्त के ऐतबार से, क़ुरान हकीम के बारे में हमारे अक़ीदे पर किफ़ायत करेंगे। लेकिन इन्हीं तीन जुमलों के बारे में अगर ज़रा तफ़्सील से गुफ़्तगू की जाये और दिक़्क़ते नज़र से इन पर ग़ौर किया जाये तो कुछ इल्मी हक़ाइक सामने आते हैं। तम्हीदी ग़ुफ़्तगू में इनमें से बाज़ की तरफ़ इज्मालन इशारा मुनासिब मालूम होता है।
(1)  क़ुरान : अल्लाह तआला का कलाम
सबसे पहली बात कि क़ुरान मजीद अल्लाह का कलाम है, ख़ुद क़ुरान मजीद से साबित है। चुनाँचे सूरतुल तौबा की आयत 6 में अल्लाह तआला ने नबी अकरम से फ़रमाया:
{ وَاِنْ اَحَدٌ مِّنَ الْمُشْرِكِيْنَ اسْتَجَارَكَ فَاَجِرْهُ حَتّٰي يَسْمَعَ كَلٰمَ اللّٰهِ ثُمَّ اَبْلِغْهُ مَاْمَنَهٗ  }
“और अगर मुशरिकीन में से कोई शख़्स पनाह माँग कर तुम्हारे पास आना चाहे (ताकि अल्लाह का कलाम सुने) तो उसे पनाह दे दो यहाँ तक कि वह अल्लाह का कलाम सुन ले, फिर उसे उसकी अमन की जगह तक पहुँचा दो।”
जब सूरतुल तौबा की पहली छ: आयात नाज़िल हुईं, जिनमें से मुशरिकीने अरब को आख़िरी अल्टीमेटम दे दिया गया कि अगर तुम ईमान लाये तो चार माह की मुद्दत के ख़ात्मे के बाद तुम्हारा क़त्लेआम शुरू हो जायेगा, तो इस ज़िमन में नबी अकरम को एक हिदायत यह भी दी गई कि यह अल्टीमेटम दिये जाने के बाद अगर मुश्रिकीन में से कोई आप की पनाह तलब करे तो वह आप के पास आकर मुक़ीम हो और कलाम अल्लाह को सुने, जिस पर ईमान लाने की दावत दी जा रही है, फिर उसे उसकी अमन की जगह तक पहुँचा दिया जाये। यानि ऐसा नहीं होना चाहिए कि वहीं उससे मुतालबा किया जाये कि फ़ैसला करो कि आया तुम ईमान लाते हो या नहीं। इस वक़्त मैंने इस आयत का हवाला सिर्फ़ “कलाम अल्लाह” के अल्फ़ाज़ के लिए शहादत के तौर पर दिया है।

कलाम इलाही : जुमला सिफ़ाते इलाहिया का मज़हर
क़ुरान मजीद के कलाम अल्लाह होने में ही इसकी असल अज़मत का राज़ मज़्मर है। इसलिए कि कलाम मुतकल्लिम की सिफ़त होता है और उसमें मुतकल्लिम की पूरी शख़्सियत हवीदा होती है। चुनाँचे आप किसी भी शख़्स का कलाम सुन कर अंदाज़ा कर सकते हैं कि उसके इल्म और फ़हम शऊर की सतह क्या है। आ या वह तालीम याफ़्ता इंसान है, महज़ब है, मुतमदन है या कोई उजड्ड गँवार है। इस ऐतबार से दरहक़ीक़त यह कलाम अल्लाह, अल्लाह तआला की जुमला सिफ़ात का मज़हर है, इसी हक़ीक़त को अल्लामा इक़बाल ने निहायत ख़ूबसूरत अंदाज़ में बयान किया:
फ़ाश गोयम आँच दर दिल मज़मर अस्त
ईं किताबे नीस्त, चीज़े दीगर अस्त
मिसल हक़ पिन्हाँ व हम पैदा सत ईं!
ज़िन्दा व पाइन्दा व गोया सत ईं!
(जो बात मेरे दिल में छुपी हुई है वह मैं साफ़-साफ़ कह देता हूँ कि यह (क़ुरान हकीम) किताब नहीं है, कोई और ही शय है। चुनाँचे यह हक़ तआला की ज़ात के मानिंद पोशीदा भी है और ज़ाहिर भी है। नेज़ यह हमेशा ज़िन्दा और बाक़ी रहने वाला भी है और यह कलाम भी करता है।)
मुख़्तलिफ़ मफ़ाहीम मायने के लिए इस शेर का हवाला दे दिया जाता है, लेकिन क़ाबिले ग़ौर बात यह है कि इसमें इसके “चीज़े दीगर” होने का कौनसा पहलू उजागर किया जा रहा है। इसमें दर हक़ीक़त सूरतुल हदीद के उस मुक़ाम की तरफ़ इशारा हो गया है कि: { هُوَ الْاَوَّلُ وَالْاٰخِرُ وَالظَّاهِرُ وَالْبَاطِنُ ۚ } (आयत 3) यानि अल्लाह तआला की शान यह है कि वह الاوّل भी है और الاخر भी, वह الظاهر भी है और الباطن भी। इसी तरह अल्लामा कहते हैं कि इस क़ुरान की भी यही शान है। नेज़ जिस तरह अल्लाह तआला की सिफ़त الحیّ القیّوم (आयतल कुर्सी, सूरतुल बक़रह) है इसी तरह यह कलाम भी ज़िन्दा पाइन्दा है, हमेशा रहने वाला है। फिर यह सिर्फ़ कलाम नहीं, ख़ुद मुतकल्लिम (बात करने वाला) है।
यहाँ कलाम और मुतकल्लिम के माबैन (दर्मियान) फर्क़ के हवाले से मुतकल्लमीन कि उस बहस की तरफ़ इशारा करना ज़रूरी मालूम होता है कि ज़ाते हक़ की सिफ़ात, ज़ात से अलैहदा और मुस्तज़ाद हैं या ऐन ज़ात? अल्लामा इक़बाल ने भी अपनी मशहूर नज़्म “इब्लीस की मजलिस-ए-शूरा” में इस बहस का ज़िक्र किया है:
हैं सिफ़ाते ज़ाते हक़, हक़ से जुदा या एैन ज़ात?
उम्मत मरहूम की है किस अक़ीदे में निज़ात?
यह इल्मे कलाम का एक निहायत ही पेचीदा, ग़ामज़ और अमीक़ मसला है, जिस पर बड़ी बहसें हुईं और बिलआख़िर मुतकल्लमीन का इस पर तक़रीबन इज्माअ हुआ कि “لَا عَیْنٌ وَلَا غَیْرٌ” यानि अल्लाह की सिफ़ात को उसकी ज़ात का एैन क़रार दिया जा सकता है उसका ग़ैर। अगर इस हवाले से ग़ौर करें तो क़ुरान हकीम भी, जो अल्लाह तआला की सिफ़त है, इसी के ज़ेल में आयेगा, यानि ना इसे अल्लाह का ग़ैर कहा जा सकता है उसका एैन।
चुनांचे इस हवाले से सूरतुल हश्र की आयत 21 क़ुरान मजीद की फी नफ़्सी अज़मत के ज़िमन में अहम तरीन है:
{لَوْ اَنْزَلْنَا هٰذَا الْقُرْاٰنَ عَلٰي جَبَلٍ لَّرَاَيْتَهٗ خَاشِعًا مُّتَصَدِّعًا مِّنْ خَشْيَةِ اللّٰهِ  ۭ وَتِلْكَ الْاَمْثَالُ نَضْرِبُهَا لِلنَّاسِ لَعَلَّهُمْ يَتَفَكَّرُوْنَ     21؀}
“अगर हम इस क़ुरान को किसी पहाड़ पर उतार देते तो तुम देखते कि वह अल्लाह तआला की ख़शियत और ख़ौफ से दब जाता और फट जाता, और यह मिसालें हैं जो हम लोगों के लिए बयान करते हैं ताकि वह ग़ौर करें।”
इस तम्सील को सूरतुल आराफ़ की आयत 143 के हवाले से समझा जा सकता है जिसमें अल्लाह तआला की तलबी पर हज़रत मूसा अलै० के कोहे तूर पर हाज़िर होने का वाक़िया बयान हुआ है। यह वही तलबी थी जिसमें आप अलै० को तौरात अता की गयी। उस वक़्त अल्लाह तआला ने हज़रत मूसा अलै० को मुख़ातबह मुकालमह से सरफ़राज़ फ़रमाया तो उनकी आतिशे शौक़ कुछ और भड़की और उन्होंने फ़रमाइश करते हुए कहा {رَبِّ اَرِنِيْٓ اَنْظُرْ اِلَيْكَ    ۭ } परवरदिगार! मुझे अपना दीदार अता फ़रमा।” मुख़ातबह मुकालमह के शर्फ़ से तूने मुझे मुशर्रफ फ़रमाया है, अब ज़रा मज़ीद करम फ़रमा। इस पर जवाब मिला: {لَنْ تَرٰىنِيْ} “(मूसा) तुम मुझे हरगिज़ नहीं देख सकते!” {وَلٰكِنِ انْظُرْ اِلَى الْجَبَلِ} “लेकिन ज़रा उस पहाड़ की तरफ़ देखो” मैं उस पर अपनी एक तजल्ली डालूँगा। {فَاِنِ اسْـتَــقَرَّ مَكَانَهٗ فَسَوْفَ تَرٰىنِيْ ۚ} “चुनांचे अगर वह पहाड़ अपनी जगह पर क़ायम रह जाये तो फिर तुम भी गुमान कर लेना कि तुम मुझे देख सकोगे।“ {فَلَمَّا تَجَلّٰى رَبُّهٗ لِلْجَبَلِ جَعَلَهٗ دَكًّا وَّخَرَّ مُوْسٰي صَعِقًا   ۚ } “फिर जब अल्लाह तआला ने उस पहाड़ पर अपनी तजल्ली डाली तो वह “(دَکٍّا دَکٍّا) रेज़ा-रेज़ा” हो गया और मूसा अलै० बेहोश होकर गिर पड़े।”
यहाँ دَکٍّا” के दोनों तर्जुमे किये जा सकते हैं, यानि रेज़ा-रेज़ा हो जाना, टूट-फूट कर टुकडे-टुकडे हो जाना, या कूट-कूट कर किसी शय को हमवार कर देना, बराबर कर देना। जैसे सूरतुल फ़जर की आयत { كَلَّآ اِذَا دُكَّتِ الْاَرْضُ دَكًّا دَكًّا   21۝ۙ} में इन मायनों में वारिद हुआ है। वही लफ़्ज़ यहाँ पहाड़ के बारे में आया है। यानी वह पहाड़ रेज़ा-रेज़ा हो गया या दब गया, ज़मीन के साथ बैठ गया। मूसा अलै० ने अल्लाह तआला की यह तजल्ली देखी जो बिलवास्ता थी, यानि बराहे रास्त हज़रत मूसा अलै० पर नहीं बल्कि पहाड़ पर थी और हज़रत मूसा अलै० बिलवास्ता उसका नज़ारा कर रहे है थे, लेकिन ख़ुद हज़रत मूसा अलै० की कैफ़ियत यह हुई कि { وَّخَرَّ مُوْسٰي صَعِقًا} “हज़रत मूसा (अलै०) बेहोश होकर गिर पड़े।”
यहाँ ज़ात सिफ़ाते बारी तआला की बहस का एक अक़ीदा हल हो जाता है कि जैसे अल्लाह तआला ने अपनी ज़ात की तजल्ली पहाड़ पर डाली तो वह पहाड़ दब गया फट गया, रेज़ा-रेज़ा हो गया, इसी तरह क़ुरान मजीद के मुताल्लिक़ फ़रमाया:
{لَوْ اَنْزَلْنَا هٰذَا الْقُرْاٰنَ عَلٰي جَبَلٍ لَّرَاَيْتَهٗ خَاشِعًا مُّتَصَدِّعًا مِّنْ خَشْيَةِ اللّٰهِ  ۭ }
यानि कलाम अल्लाह की भी वही कैफ़ियत और तासीर है जो कैफ़ियत व तासीर तजल्लिये ज़ाते इलाही की है। इसलिए कि क़ुरान अल्लाह का कलाम और अल्लाह की सिफ़त है। तो तजल्लिये सिफ़ात और तजल्लिये ज़ात में कोई फ़र्क नहीं।
अलबत्ता अल्लामा इक़बाल ने एक जगह इस बारे में ज़रा मुबालगा आराई से काम लिया। अल्लामा ने हुज़ूर की मदह फ़रमाते हुए यह अल्फ़ाज़ इस्तेमाल किये:
मूसा  ज़े   होश  रफ़त  बैक  जलवये  सिफ़ात
तो  एैने  ज़ात  मी   नगरी    तबस्समी!
अल्लामा हज़रत मोहम्मद का हज़रत मूसा अलै० से तक़ाबुल कर रहे हैं कि वह तो तजल्लिये सिफ़ात के बिलवास्ता नज़ारे ही से बेहोश होकर गिर गये, लेकिन ऐ नबी ! आपने एैने ज़ात का दीदार किया और तबस्सुम की कैफ़ियत में किया। इसमें दो ऐतबारात से मुग़ालता पाया जाता है। अव्वल तो वह तजल्ली, तजल्लिये सिफ़ात नहीं तजल्लिये ज़ात थी जो हज़रत मूसा अलै० की फ़रमाईश पर अल्लाह तआला ने पहाड़ पर डाली। जैसा कि क़ुरान मजीद में है: { فَلَمَّا تَجَلّٰى رَبُّهٗ لِلْجَبَلِ} गोया यहाँ अल्लाह तआला के लिए यह लफ़्ज़ इस्तेमाल हुआ है कि वह ख़ुद मुतजल्ली हुआ। दूसरे यह कि यह ख्याल भी मुख्तलिफ़ फ़ेह है कि नबी अकरम ने शबे मेराज में ज़ाते इलाही का मुशाहदा किया। अगरचे हमारे असलाफ़ में यह राय भी है कि आप ने अल्लाह तआला को देख़ा है, लेकिन अकसर बेशतर की राय इसके बरअक्स है, इसलिए कि वहाँ भी “आयात” का ज़िक्र है। जैसा कि सूरतुल नज्म में आया: { لَقَدْ رَاٰى مِنْ اٰيٰتِ رَبِّهِ الْكُبْرٰى   18؀} इसमें कोई शक नहीं कि वह आयात, जो वहाँ हुज़ूर नबी अकरम ने देखीं, अल्लाह तआला की अज़ीम-तरीन आयात में से हैं।
{ لَقَدْ رَاٰى مِنْ اٰيٰتِ رَبِّهِ الْكُبْرٰى   18؀ مَا زَاغَ الْبَصَرُ وَمَا طَغٰى   17؀ اِذْ يَغْشَى السِّدْرَةَ مَا يَغْشٰى   16؀ۙ}
“उस वक़्त बेरी पर छा रहा था जो कुछ कि छा रहा था। निगाह ना चुन्धियाई और ना हद से मुतजाविज़ हुई। और उसने अपने रब की बड़ी-बड़ी निशानियाँ देखीं।“
अब उससे ज़्यादा बड़ी आयात और उससे ज़्यादा बड़ी तजल्लिये इलाही और कहाँ होगी? लेकिन दोनों ऐतबार से इस शेर में मुबालगा है। अलबत्ता इस आयते मुबारका के हवाले से अल्लामा के इस शेर
मिसले  हक़  पिन्हाँ    हम  पैदा  सत  ईं!
ज़िन्दा      पाइन्दा   व   गोया   सत  ईं!
में मेरे नज़दीक क़तअन कोई मुबालगा नहीं है। और इस आयत मुबारका के हवाले से वह बात कही जा सकती है जो अल्लामा इक़बाल ने इस शेर में कही है।

तौरात की गवाही
अब ज़रा क़ुरान मजीद के कलामुल्लाह होने के हवाले से एक और बात ज़हननशीन कर लीजिये। तौरात में किताबे इस्तस्ना या सफ़रे इस्तस्ना जो सुहुफ़े मूसा में से एक सहीफ़ा है, के अट्ठारहवें बाब में नबी अकरम के लिए जो पेशनगोई बयान की गयी है उसमें अल्फ़ाज़ यहीं है कि:
“मैं उनके भाईयों में से उनके लिए तेरी मानिंद एक नबी बरपा करुँगा और उसके मुँह में अपना कलाम डालूँगा और वह उनसे वही कुछ कहेगा जो मैं उससे कहूँगा।”
मैंने यहाँ ख़ास तौर पर उन अल्फ़ाज़ का हवाला दिया है कि “मैं उसके मुँह में अपना कलाम डालूँगा।” यहाँ एक तो लफ़्ज़ कलाम आया है जैसे कि क़ुरान हकीम की इस आयत में आया { حَتّٰي يَسْمَعَ كَلٰمَ اللّٰهِ} फिर “कलाम मुँह में डालना” के हवाले से क़ुरान मजीद में एक लफ़्ज़ दो मर्तबा आया है, वह लफ़्ज़ “क़ौल” है, यानी क़ुरान को क़ौल क़रार दिया गया है।
सूरतुल हाक़्क़ा में है:
{ اِنَّهٗ لَقَوْلُ رَسُوْلٍ كَرِيْمٍ    40؀ڌ} { وَّمَا هُوَ بِقَوْلِ شَاعِرٍ ۭ قَلِيْلًا مَّا تُؤْمِنُوْنَ     41؀ۙ } { وَلَا بِقَوْلِ كَاهِنٍ ۭ قَلِيْلًا مَّا تَذَكَّرُوْنَ   42؀ۭ }
और सूरतुल तकवीर में यह अल्फ़ाज़ वारिद हुए हैं:
{اِنَّهٗ لَقَوْلُ رَسُوْلٍ كَرِيْمٍ  19۝ۙ} {ذِيْ قُوَّةٍ عِنْدَ ذِي الْعَرْشِ مَكِيْنٍ  20۝ۙ} {مُّطَاعٍ ثَمَّ اَمِيْنٍ   21۝ۭ} {وَمَا صَاحِبُكُمْ بِمَجْنُوْنٍ  22۝ۚ}
और इसी सूरह में आगे चलकर आया:
{وَمَا هُوَ بِقَوْلِ شَيْطٰنٍ رَّجِيْمٍ  25؀ۙ}
क़ाबिले तवज्जह अम्र यह है कि इन दो मक़ामात में से मौअक्खर अज़ज़िक्र के मुताल्लिक़ तक़रीबन इजमाअ है कि यहाँ हज़रत जिब्राईल अलै० मुराद हैं। गोया क़ुरान को उनका क़ौल क़रार दिया गया। और सूरतुल हाक़्क़ा में इसे नबी का क़ौल क़रार दिया जा रहा है। अब ज़ाहिर है यहाँ जिन चीजों की नफ़ी की जा रही है कि “यह किसी शायर का क़ौल नहीं” और “यह किसी काहिन का क़ौल नहीं” इनसे यक़ीनन रसूल करीम मुराद हैं। यूँ समझिये कि अल्लाह का कलाम पहले हज़रत जिब्राईल अलै० पर नाज़िल हुआ। अगर मैं किताबे इस्तस्ना के अल्फ़ाज़ इस्तेमाल करुँ तो यहाँ “अल्लाह ने अपना कलाम उनके मुँह मे डाला।” ताहम “उनके मुँह” का हम कोई तसव्वुर नहीं कर सकते, वह निहायत जलीलो क़द्र फ़रिश्ते हैं। बहरहाल क़ौल का लफ़्ज़ क़ुरान मजीद के लिये इस्तेमाल हुआ है जिससे ज़ाहिर है कि इब्तदाअन कलामे इलाही हज़रत जिब्रील अलै० के क़ौल की शक्ल में उतरा और फिर हज़रत जिब्रील अलै० के ज़रिये से हज़रत मोहम्मद रसूल अल्लाह के मुँह में डाला गया, और वहाँ से यह  क़ौले मोहम्मद की सूरत में लोगों के सामने आया, इसलिये कि यह आप ही की ज़बाने मुबारक से अदा हुआ, लोगों ने उसे सिर्फ़ आप ही के ज़बाने मुबारक से सुना। गोया यह क़ौल, क़ौले शायर नहीं, यह क़ौले काहिन नहीं, यह क़ौले शैतान रजीम नहीं, बल्कि यह क़ौले रसूले करीम है और रसूले करीम अव्वलन मोहम्मद रसूल अल्लाह हैं, यह लोगों के सामने उनके क़ौल की हैसियत से आया है। फिर सनियन (दूसरे) यह हज़रत जिब्राईल अलै० का क़ौल है, इसलिये कि उन्होंने यह क़ौल हुज़ूर को पहुँचाया। और इसको आख़िरी दर्जे तक पहुँचाने पर यह अल्लाह का कलाम है जिसके मुताल्लिक़ तौरात में अल्फ़ाज़ आये हैं कि “मैं उसके मुँह में अपना कलाम डालूँगा।”

लौहे महफ़ूज़ और मुसहफ़ में मुताबक़त
कलाम होने के हवाले से तीसरी बात यह नोट कीजिये कि कलाम अल्लाह की सिफ़त है और अल्लाह की सिफ़ात क़दीम (प्राचीन) है। अल्लाह की ज़ात की तरह उसकी सिफ़ात का भी यही मामला है। ज़ाहिर है कि अल्लाह तआला माद्दियत (पदार्थवादी) और जिस्मानियत (भौतिक उपस्थिति) से मा वरा है। यही मामला अल्लाह की सिफ़ात का भी है चुनांचे कलाम अल्लाह, जिसे हर्फ़ो सूत की महदूदियत (परिसीमाओं) से आला अरफ़ा ख़्याल किया जाता है, उसे अल्लाह तआला ने इंसानों की हिदायत के लिये हरूफ़ व असवात का जामा (लिबास) पहनाया और सय्यदुल मुर्सलीन के क़ल्बे मुबारक पर बतरीक़े तन्ज़ील नाज़िल फ़रमाया। यही कलाम लौहे महफ़ूज़ में अल्लाह के पास मंदर्ज (लिखा हुआ महफ़ूज़ है) है जिसे उम्मुल किताब या किताबे मकनून भी कहा गया है। हमारे पास मौजूद क़ुरान मजीद या मुसहफ़ की इबारत बैन ही (बिल्कुल) वही है जो लौहे महफ़ूज़ या उम्मुल किताब में है, बिल्कुल उसी तरह जैसे किसी दस्तावेज़ की मस्दक़ह नक़ल (xerox copy) हो, जो बगैर किसी शोशे के फ़र्क़ के असल के मुताबिक़ हो। चुनांचे सूरतुल बुरूज में फ़रमाया:
{ فِيْ لَوْحٍ مَّحْفُوْظٍ   22؀ۧ  بَلْ هُوَ قُرْاٰنٌ مَّجِيْدٌ    21؀ۙ }
“यह क़ुरान निहायत बुज़ुर्ग बरतर है और यह लौहे महफ़ूज़ में है।”
इसी के मुताल्लिक़ सूरतुल वाक़िया में इर्शाद फ़रमाया गया:
{لَّا يَمَسُّهٗٓ اِلَّا الْمُطَهَّرُوْنَ   79۝ۭ فِيْ كِتٰبٍ مَّكْنُوْنٍ   78۝ۙ اِنَّهٗ لَقُرْاٰنٌ كَرِيْمٌ   77۝ۙ}
“यह तो एक किताब है बड़ी करीम, बहुत बाइज़्ज़त, और एक ऐसी किताब है जो छुपी हुई है। जिसे छू ही नहीं सकते मगर वही जो बहुत ही पाक कर दिए गए हैं।”
यानी मलाइका मुक़र्रबीन, जिनके बारे में एक और मक़ाम पर फ़रमाया गया:
{ كِرَامٍۢ بَرَرَةٍ     16؀ۭ  بِاَيْدِيْ سَفَرَةٍ    15؀ۙ  مَّرْفُوْعَةٍ مُّطَهَّرَةٍۢ   14۝ۙ  فِيْ صُحُفٍ مُّكَرَّمَةٍ  13؀ۙ} (सूरह अ’बसा)
“यह ऐसे सहीफों में दर्ज है जो मुकरर्म हैं, बुलंद मर्तबा है, पाकीज़ा है, मौअज्ज़ज़ और नेक कातिबों के हाथों में रहते हैं।”
दर हक़ीकत यह किताब मकनून उन फरिश्तों के पास है, वह तुम्हारी रसाई (पहुँच) से बईद व मा वरा (बहुत दूर) है।
यही बात सूरतुल ज़ुख़रफ में कही गयी है:
{ وَاِنَّهٗ فِيْٓ اُمِّ الْكِتٰبِ لَدَيْنَا لَعَلِيٌّ حَكِيْمٌ  } (आयत 4)
“यह तो दर हक़ीक़त असल किताब में हमारे पास महफ़ूज़ है, बड़ी बुलंद मर्तबा और हिकमत से लबरेज़ (भरी हुई है)।”
اُمّ का लफ़्ज़ जड़ और बुनियाद के लिये आता है। इसलिये माँ के लिये भी अरबी में लफ़्ज़ اُمّ” इस्तेमाल होता है, क्योंकि इसी के बतन से औलाद की विलादत होती है, वह गोया कि बमंज़िले असास है। चुनाँचे इस किताब की असल असास लौहे महफ़ूज़ में है, किताबे मकनून में है। मज़ीद वज़ाहत कर दी गई कि “لَدَیْنَا” यानि वह उम्मुल किताब जो हमारे पास है, उसमें यह क़ुरान दर्ज है। “لَعَلِیٌّ حَکِیْمٌ” इस क़ुरान की सिफ़ात यह हैं कि वह बहुत बुलंद बाला और हिकमत वाला है, मुस्तहकम है। वह अल्लाह का कलाम और निहायत महफ़ूज़ किताब है। इसे लौहे महफ़ूज़ कहें, किताबे मकनून कहें या उम्मुल किताब कहें, असल कलाम वहाँ है--- उसी आलम-ए-ग़ैब में, उसी आलम-ए-अम्र में--- जिसे सिवाये उन पाक-बाज़ फ़रिश्तों के जिनकी रसाई लौहे महफ़ूज़ तक हो, कोई मस्स (छू) नहीं कर सकता, यानि इस लौहे महफ़ूज़ के मज़ामीन पर मुत्तेलह नहीं हो सकता। अलबत्ता अल्लाह तआला ने इंसानों की हिदायत के लिये मुहम्मद रसूल अल्लाह पर अपने इस कलाम की तन्ज़ील फ़रमाई और इसकी इबारत को ता-क़यामे क़यामत तक मुसाहफ़ में महफ़ूज़ फ़रमा दिया और नापाक हाथों से छूने पर मना फ़रमा दिया।

कलामे इलाही की तीन सूरतें
जब मैंने अर्ज़ किया कि क़ुरान अल्लाह का कलाम है तो यहाँ सवाल पैदा होता है कि अल्लाह तआला इंसान से किस तरह हमकलाम होता है! क़ुरान मजीद में इसकी तीन शक्लें बयान हुई हैं।
{وَمَا كَانَ لِبَشَرٍ اَنْ يُّكَلِّمَهُ اللّٰهُ اِلَّا وَحْيًا اَوْ مِنْ وَّرَاۗئِ حِجَابٍ اَوْ يُرْسِلَ رَسُوْلًا فَيُوْحِيَ بِاِذْنِهٖ مَا يَشَاۗءُ ۭ اِنَّهٗ عَلِيٌّ حَكِيْمٌ       51؀} (सूरतुल शौरा)
“किसी बशर का यह मक़ाम नहीं है कि अल्लाह उससे रू-ब-रू बात करे। उसकी बात या तो वही (इशारे) के तौर पर होती है, या पर्दे के पीछे से, या फिर वह कोई पैग़म्बर (फ़रिश्ता) भेजता है और वह उसके हुक्म से जो कुछ वह चाहता है वही करता है। यक़ीनन वह बरतर और साहिबे हिकमत है।”
नोट करने की बात यह है कि यह नहीं फ़रमाया कि अल्लाह के लिये यह मुमकिन नहीं है, अल्लाह तो हर शय पर क़ादिर है, वह जो चाहता है कर सकता है, अल्लाह की क़ुदरत से कोई चीज़ बईद (दूर) नहीं है, बल्कि कहा कि इंसान का यह मक़ाम नहीं है कि अल्लाह उससे बराहे रास्त कलाम करे, किसी बशर का यह मर्तबा नहीं है कि अल्लाह उससे कलाम करे, सिवाये तीन सूरतों के, या तो वही यानि मख्फ़ी इशारे के ज़रिये से, या पर्दे के पीछे से, या वह किसी रसूल (रसूले मलक) को भेजता है जो वही करता है अल्लाह के हुक्म से जो अल्लाह चाहता है।
अब कलामे इलाही की मज़कूरा तीन शक्लें हमारे सामने आई हैं। इनमें से दो के लिये लफ़्ज़ वही आया है। दरमियान में एक शक्ल “مِنْ وَرَآءِ حِجَابٍ” बयान हुई है। इसका तज़करा सूरतुल आराफ़ की आयत 143 के ज़ेल में हो चुका है। और यह तो अम्र वाक़िया है ही कि हज़रत मूसा अलै० से अल्लाह तआला ने मुताददिद (कईं) मौक़ों पर इस सूरत में कलाम फ़रमाया।
पहली मर्तबा हज़रत मूसा अलै० जब आग की तलाश में कोहे तूर पर पहुँचे तो वहाँ मुख़ातबा हुआ। यह मुख़ातबा और मुकालमा-ए-इलाही (बात-चीत) हज़रत मूसा अलै० के साथ مِنْ وَرَآءِ حِجَابٍ” हुआ था, इसी लिये तो वह आतिशे शौक़ भड़की थी कि:
क्या क़यामत है कि चिलमन से लगे बैठे हैं
साफ छुपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं!
ज़ाहिर है कि जब हम कलाम होने का शर्फ़ हासिल हो रहा है तो एक क़दम और बाक़ी है कि मुझे दीदार भी अता हो जाए, लेकिन यह मुख़ातबा مِنْ وَرَآءِ حِجَابٍ था। नबी अकरम से यही मुख़ातबा शबे मेराज में पर्दे के पीछे से हुआ। बाज़ हज़रात की राय है कि हुज़ूर को अल्लाह तआला (यानि ज़ाते इलाही) का दीदार हासिल हुआ, लेकिन मेरी राय सलफ़ में से उन हज़रात के साथ है जो इसके क़ायल नहीं हैं। उनमें हज़रत आयशा सिद्दीक़ा رضی اللہ عنھا बड़ी अहमियत कि हामिल हैं, उन्होंने हुज़ूर से लाज़िमन इन चीज़ों के बारे में इस्तफ़सार किया (पूछा) होगा, चुनाँचे उनकी बात के मुताल्लिक़ तो हम यक़ीन के दर्जे में कह सकते हैं कि वह मोहम्मद रसूल से मरफ़ूअ है। हज़रत आयशा رضی اللہ عنھا बयान करतीं हैं कि “نُوْرٌ اَنّٰی یُرٰی؟” यानि अल्लाह तो नूर है, उसे कैसे देखा जा सकता है? (मुस्लिम, किताबुल ईमान, अ़न अबु ज़र رضی اللہ عنہ) नूर तो दूसरी चीज़ों को देखने का ज़रिया बनता है, नूर ख़ुद कैसे देखा जा सकता है! बहरहाल मेरी राय यह कि यह गुफ़्तग़ू भी مِنْ وَرَآءِ حِجَابٍ थी। वह वराये हिजाब (पर्दे के पीछे से) गुफ़्तग़ू जो हज़रत मूसा अलै० को कोहे तूर पर मकालमा मुख़ातबा में नसीब हुई, उस वराये हिजाब मुलाक़ात और गुफ़्तगू (बात-चीत) से अल्लाह तआला ने मुहम्मद रसूल अल्लाह को शबे मेराज में عِنْدَ سِدْرَۃِ الْمُنْتَھٰی” मुशर्रफ़ फ़रमाया।
अलबत्ता वही बराहे रास्त भी है, यानि बग़ैर फ़रिश्ते के वास्ते के। दूसरी क़िस्म की वही फ़रिश्ते के ज़रिये से है और क़ुरान मजीद से जिस बात की तरफ़ ज़्यादा रहनुमाई मिलती है वह यह है कि क़ुरान वही है बवास्ता “मलक”। जैसे क़ुरान मजीद में है: {... عَلٰي قَلْبِكَ  نَزَلَ بِهِ الرُّوْحُ الْاَمِيْنُ   ١٩٣؀ۙ} (अल शूराअ:194) “इसे लेकर आपके दिल पर रूहे अमीन उतरा है...”  और { فَاِنَّهٗ نَزَّلَهٗ عَلٰي قَلْبِكَ} (अल बक़रह:97) “पस इसे जिब्रील ने ही आपके क़ल्ब पर नाज़िल किया।” अलबत्ता फ़रिश्ते के बग़ैर वही, यानि दिल में किसी बात का अल्लाह तआला की तरफ़ से बराहे रास्त (सीधा) डाल दिया जाना, यानि “इल्हाम” का ज़िक्र भी हुज़ूर ने किया है और इसके लिये हदीस में نَفَث فِی الرَّوع” के अल्फ़ाज़ भी आये हैं। यानि किसी ने दिल में कोई बात डाल दी, किसी ने फूँक मार दी बग़ैर इसके कि कोई आवाज़ सुनने में आई हो। एक कैफ़ियत सिलसिलातुल जर्स की भी थी। हुज़ूर को घंटियों की सी आवाज़ आती थी और उसके बाद हुज़ूर के क़ल्बे मुबारक पर वही नाज़िल हो जाती थी।
बहरहाल यक़ीन के साथ तो मैं नहीं कह सकता, लेकिन मेरा गुमाने ग़ालिब है कि दूसरी क़िस्म की वही (बज़रिये फ़रिश्ता) पर पूरे का पूरा क़ुरान मुश्तमिल है। और वही बराहे रास्त यानि “القاء” तो दर हक़ीक़त वही ख़फी है, जिसकी वज़ाहत अंग्रेज़ी के दो अल्फ़ाज़़ के दरमियान फ़र्क से बख़ूबी हो जाती है। एक लफ़्ज़ है inspiration और दूसरा revelation, जिसके साथ एक और लफ़्ज़ verbal revelation भी अहम है। Inspiration में एक मफ़हूम, एक ख़्याल या तसव्वुर इंसान के ज़हन क़ल्ब में जाता है, जबकि revelation बाक़ायदा किसी चीज़ के किसी पर reveal किये जाने को कहते हैं। और इसमें भी ईसाईयों के यहाँ एक बड़ी साजिश चल रही है। वह revelation को मानते हैं लेकिन verbal revelation को नहीं मानते, बल्कि उनके नज़दीक सिर्फ़ मफ़हूम ही अम्बिया के क़ुलूब पर नाज़िल किया जाता था, जिसे वह अपने अल्फ़ाज़ में अदा करते थे। जबकि हमारे यहाँ इस बारे में मुस्तक़िल इज़्माई (हमेशा से पूरी उम्मत का) अक़ीदा है कि यह अल्लाह का कलाम है जो मुहम्मद रसूल अल्लाह पर नाज़िल हुआ। यह लफ़्जन भी वही है और मायनन भी, लफ़्जन भी अल्लाह का कलाम है और मायनन भी, यानि यह verbal revelation है।
इस ज़िमन (बारे) में एक दिलचस्प वाक़िया लाहौर ही में ग़ालिबन एफ० सी० कॉलेज के प्रिसिंपल और अल्लामा इक़बाल के दरमियान पेश आया था। वह दोनों किसी दावत में इकट्ठे थे कि उन साहब ने हज़रते अल्लामा से कहा कि मैंने सुना है कि आप भी verbal revelation के क़ायल हैं! इस पर अल्लामा ने उस वक़्त जो जवाब दिया वह उनकी ज़हानत पर दलालत करता (सबूत देता) है। उन्होंने कहा कि जी हाँ, मैं verbal revelation को सिर्फ़ मानता हूँ, बल्कि मुझे तो इसका ज़ाति तजुर्बा हासिल है। चुनाँचे ख़ुद मुझ पर जब शेर नाज़िल होते हैं तो वह अल्फ़ाज़ के जामे में ढ़ले हुए आते हैं, मैं कोई लफ़्ज़ बदलना चाहूँ तो भी नहीं बदल सकता, मालूम होता है कि वह मेरी अपनी तख़्लीक़ नहीं हैं बल्कि मुझ पर नाज़िल किये जाते हैं। तो यह दर हक़ीक़त किसी को जवाब देने का वह अंदाज़ है जिसको अरबी में الاجوبۃ المُسکتۃ” यानि चुप करा देने वाला जवाब कहा जाता है। यह वह जवाब है जिसके बाद फ़रीक़ सानी के लिये किसी क़ैल व क़ाल का मौका ही नहीं रहता।
बहरहाल कलामे इलाही वाक़िअतन verbal revelation है जिसने अव्वलन क़ौले जिब्रील की शक्ल इख़्तियार की। हज़रत जिब्रील अलै० के जरिये क़ौल की शक़्ल में नाज़िल हुआ। और फिर ज़बाने मुहम्मदी की शक़्ल में अदा हुआ। तो यह दर हक़ीक़त revelation है, inspiration नहीं, और महज़ revelation भी नहीं बल्कि verbal revelation है, यानि मायने, मफ़हूम और अल्फ़ाज़ सबके सब अल्लाह तआला की तरफ़ से हैं और यह बहैसियत-ए-मजमूई (पूरे का पूरा) अल्लाह का कलाम है।
To be cont...
Translated from Bayanul Quran Book. Page 4-8

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