आयत 103 {وَاعْتَصِمُوْا بِحَبْلِ اللّٰهِ جَمِيْعًا وَّلَا تَفَرَّقُوْا} “अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से थाम लो
मिल-जुल कर और तफ़रक़े में ना पड़ो.”
Translated from Bayanul Quran, Part-2, Page No. 29-30 (Dr. Israr Ahmed Rahimullah)
Find Original Book here in Urdu: http://204.12.241.218/videos/tanzeem/videos/BOOKS/1_-_Quran-e-Hakeem_aur_Hamari_Zindagi/BU-1-14-Bayan-ul-Quran-2.pdf
याद रहे कि इससे पहले आयत 101 इन
अल्फाज़ पर ख़त्म हुई है: “और जो कोई अल्लाह तआला से चिमट जाये (अल्लाह की हिफाज़त
में आ जाये) उसको तो हिदायत हो गई सिराते मुस्तक़ीम की तरफ.” सूरतुल हज की आखरी आयत
में भी यह अल्फाज़ आया है: “और अल्लाह से चिमट जाओ!” अब अल्लाह की हिफाज़त में
कैसे आया जाये? अल्लाह से कैसे चिमटें? उसके लिये फ़रमाया: कि अल्लाह की रस्सी
से चिमट जाओ, अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से थाम लो. और यह अल्लाह की रस्सी कौनसी
है? मुताद्दिद अहादीस से वाज़ेह होता है कि यह “क़ुरान” है. एक तरफ इन्सान में तक़वा
पैदा हो, और दूसरी तरफ उसमें इल्म आना चाहिये, क़ुरान का फहम पैदा होना चाहिये,
क़ुरान के नज़रियात को समझना चाहिये, क़ुरान की हिकमत को समझना चाहिये. इंसानों में
इज्तमाइयत जानवरों के गल्लों की तरह नहीं हो सकती कि भेड़-बकरियों का एक बड़ा रेवड़
है और एक चरवाहा एक लकड़ी लेकर सबको हाँक रहा है. इंसानों को जमा करना है तो उनके
ज़हन एक जैसे बनाने होंगे, उनकी सोच एक बनानी होगी. यह हैवाने आक़िल हैं, बाशऊर लोग
हैं. इनकी सोच एक हो, नज़रियात एक हो, मक़ासिद एक हों, हम-आहंगी हो, नुक्ता-ए-नज़रिया
एक हो तभी तो यह जमा होंगे. इसके लिये वह चीज़ चाहिये जो उनमें यकरंगी ख्याल,
यकरंगी नज़र, यकजहती और मक़ासिद की हम-आहंगी पैदा कर दे, और वह क़ुरान है, जो “हब्लुल्लाह”
है.
हज़रत अली رضی اللہ عنہ से मरवी
तवील हदीस में क़ुरान हकीम के बारे में रसूल अल्लाह ﷺ के अल्फाज़ नक़ल हुए हैं: ((وَ ھُوَحَبْلُ اللہِ
الْمَتِیْنُ))(1) हज़रत
अब्दुल्लाह बिन मसऊद رضی اللہ عنہ से रिवायत है कि आँहुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया: ((کِتَابُ اللہِ، حَبْلٌ
مَمْدُودٌ مِنَ السَّمَاءِ اِلَی الْاَرْضَ))(2) “अल्लाह की किताब (को थामे रखना), यही वह मज़बूत
रस्सी है जो आसमान से ज़मीन तक तनी हुई है.” एक और हदीस में फ़रमाया: ((اَبْشِرُوْا
اَبْشِرُوْا-----فَاِنَّ ھٰذَا الْقُرْآنَ سَبَبٌ، طَرْفُہٗ بِیَدِ اللہِ
وَطَرْفُہٗ بِاَیْدِیْکُمْ))(3)
“खुश हो जाओ, खुशियाँ मनाओ..... यह क़ुरान एक वास्ता है, जिसका एक सीरा अल्लाह के
हाथ में है और एक सीरा तुम्हारे हाथ में है.” चुनांचे तक़र्रुब इलल्लाह का ज़रिया भी
क़ुरान है, और मुस्लमानों को आपस में जोड़ कर रखने का ज़रिया भी क़ुरान है.Translated from Bayanul Quran, Part-2, Page No. 29-30 (Dr. Israr Ahmed Rahimullah)
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