Thursday, October 20, 2016

और नहीं है दुनिया की ज़िन्दगी मगर खेल और कुछ जी बहला लेना.

आयत 32 “और नहीं है दुनिया की ज़िन्दगी मगर खेल और कुछ जी बहला लेना. और यक़ीनन आख़िरत का घर बेहतर है उन लोगों के लिये जो तक़वा इख़्तियार करें, तो क्या तुम अक़्ल से काम नहीं लेते?”
इसका मतलब यह नहीं लेना चाहिये कि दुनिया की ज़िन्दगी की कोई हक़ीक़त नहीं है, बल्कि तक़ाबुल में ऐसा कहा जाता है कि आख़िरत के मुक़ाबले में इसकी यही हक़ीक़त है. एक शय अब्दी है, हमेशा-हमेश की है और एक शय आरज़ी और फ़ानी है. इन दोनों का आपस में क्या मुक़ाबला? जिसे दुआये इस्तखारा में अल्फ़ाज़ आये हैं: (ऐ अल्लाह! तू ही सब कुछ जानता है, मैं कुछ नहीं जानता). इसका यह मतलब तो नहीं है कि इन्सान के पास कोई भी इल्म नहीं है, लेकिन अल्लाह के इल्म के मुक़ाबले में किसी दूसरे का इल्म कुछ ना होने के बराबर है. इसी तरह यहाँ आख़िरत के मुक़ाबले में दुनिया की ज़िन्दगी को लअब और लहव क़रार दिया गया है. वरना दुनिया तो एक ऐतबार से आख़िरत की खेती है. एक हदीस भी बयान की जाती है कि “दुनिया आख़िरत की खेती है.” यहाँ बोओगे तो वहाँ काटोगे. अगर यहाँ बोओगे नहीं तो वहाँ काटोगे क्या? यह ताल्लुक़ है आपस में दुनिया और आख़िरत का. इस ऐतबार से दुनिया एक हक़ीक़त है और एक इम्तिहानी वक़्फ़ा है. लेकिन जब आप ताक़बुल करेंगे दुनिया और आख़िरत का तो दुनिया और इसका माल व मताअ आख़िरत की अबदियत और उसकी शान व शौकत के मुक़ाबले में गोया ना होने के बराबर है. दुनिया तो महज़ तीन घंटे के एक ड्रामे की मानिन्द है जिसमें किसी को बादशाह बना दिया जाता है और किसी को फ़क़ीर. जब ड्रामा ख़त्म होता है तो ना बादशाह सलामत बादशाह हैं और ना फ़क़ीर फ़क़ीर है. ड्रामा हॉल से बाहर जाकर कपड़े तब्दील किये और सब एक जैसे बन गये. यह है दुनिया की असल हक़ीक़त. चुनाँचे इस आयत में दुनिया को खेल-तमाशा क़रार दिया गया है.
डॉक्टर इसरार अहमद बयानुल क़ुरान किताब से.
Translated from Bayanul Quran Urdu book of Dr. Israr Ahmad (RA)

Monday, October 17, 2016

शिर्क

शिर्क के बारे में यह बात वाज़ेह रहनी चाहिये कि शिर्क सिर्फ़ यही नहीं है कि कोई मूर्ति ही सामने रख कर उसको सज्दा किया जाये, बल्कि और बहुत सी बातें और बहुत से नज़रियात भी शिर्क के ज़ुमरे में आते हैं. यह एक ऐसी बीमारी है जो हर दौर में भेस बदल-बदल कर आती है, चुनाँचे इसे पहचानने के लिये बहुत वुसअत नज़री की ज़रूरत है. मसलन आज के दौर का एक बहुत बड़ा शिर्क नज़रिया-ए-वतनियत है, जिसे अल्लामा इक़बाल ने सबसे बड़ा बुत क़रार दिया है, “इन ताज़ा ख़ुदाओं में बड़ा सबसे वतन है!” यह शिर्क की वह क़िस्म है जिससे हमारे पुराने दौर के उल्मा भी वाक़िफ़ नहीं थे. इसलिये कि इस अंदाज़ में वतनियत का नज़रिया पहले दुनिया में था ही नहीं.

शिर्क के बारे में एक बहुत सख्त आयत हम दो दफ़ा सूरतुन्निसा (आयत 48 और 116) में पढ़ चुके हैं: {} “अल्लाह तआला इसे हरगिज़ माफ़ नहीं फ़रमायेगा कि उसके साथ शिर्क किया जाये, अलबत्ता इससे कमतर गुनाह जिसके लिये चाहेगा माफ़ फ़रमा देगा.” अल्लाह तआला शिर्क से कमतर गुनाहों में से जो चाहेगा, जिसके लिये चाहेगा, बगैर तौबा के भी बख्श देगा, अलबत्ता शिर्क से भी अगर इन्सान ताइब हो जाये तो यह भी माफ़ हो सकता है. 

: डॉक्टर इसरार अहमद (रहि०)

Monday, October 3, 2016

“ऐ क़ुरान के मानने वालो! तुम्हारी कोई हैसियत नहीं"

सूरह अल मायदा, आयत 68 “(ऐ नबी ) कह दीजिये: ऐ किताब वालों तुम किसी चीज़ पर नहीं हो, जब तक तुम क़ायम ना करो तौरात और इन्जील को और जो कुछ नाज़िल किया गया है तुम पर तुम्हारे रब की तरफ़ से.”
तुम्हारी कोई हैसियत नहीं है, कोई मक़ाम नहीं है, कोई जड़ बुनियाद नहीं है, तुम हमसे हमकलाम होने के मुस्तहिक़ नहीं हो. 
अब अपने लिये इस आयत को आप इस तरह पढ़ लीजिये: {} “ऐ क़ुरान के मानने वालो! तुम्हारी कोई हैसियत नहीं---- तुम समझते हो कि हम उम्मते मुस्लिमा हैं, अल्लाह वाले हैं, अल्लाह के लाड़ले और प्यारे हैं, अल्लाह के रसूल के उम्मती हैं. लेकिन तुम देख रहे हो कि ज़िल्लत व ख्वारी तुम्हारा मुक़द्दर बनी हुई है, हर तरफ़ से तुम पर यलगार है, इज़्ज़त व वक़ार नाम की कोई शय (चीज़) तुम्हारे पास नहीं रही. तुम कितनी ही तादाद में क्यों ना हो, दुनिया में तुम्हारी कोई हैसियत नहीं, और इससे भी ज़्यादा बेतौक़ीरी के लिये भी तैयार रहो. “तुम्हारी कोई असल नहीं जब तक तुम क़ायम ना करो क़ुरान को और उसके साथ जो कुछ मज़ीद तुम पर तुम्हारे रब की तरफ़ से नाज़िल हुआ है.” क़ुरान वही-ए-जली है. इसके अलावा हुज़ूर को वही-ए-ख़फ़ी के ज़रिये से भी तो अहकामात मिलते थे सुन्नते रसूल वही-ए-ख़फ़ी का ज़हूर ही तो है. तो जब तक तुम किताब व सुन्नत का निज़ाम क़ायम नहीं करते, तुम्हारी कोई हैसियत नहीं. यह भी याद रहे कि “या अहलल क़ुरान” का ख़िताब ख़ुद हुज़ूर ने हमें दिया है. मेरे किताबचे “मुसलमानों पर क़ुरान मजीद के हुक़ूक़” में यह हदीस मौजूद है जिसमें हुज़ूर से यह अल्फ़ाज़ नक़ल हुए हैं:
“ऐ अहले क़ुरान, क़ुरान को अपना तकिया ना बना लेना, बल्कि इसे पढ़ा करो रात के अवक़ात में भी और दिन के अवक़ात में भी, जैसा कि इसके पढ़ने का हक़ है, और इसे आम करो और ख़ुश अलहानी से पढ़ो और इसमें तदब्बुर करो ताकि तुम फ़लाह पाओ.”


डॉक्टर इसरार अहमद (मरहूम)

Thursday, September 22, 2016

क़िस्सा-ए-क़ाबील-ओ-हाबील (Story of Cain & Abel)

आयत 27 {وَاتْلُ عَلَيْهِمْ نَبَاَ ابْنَيْ اٰدَمَ بِالْحَقِّ } “और (ऐ नबी ) इनको पढ़ कर सुनाइये आदम अलै० के दो बेटों का क़िस्सा हक़ के साथ।”
            {ۘاِذْ قَرَّبَا قُرْبَانًا} “जबकि उन दोनों ने क़ुर्बानी पेश की”
            {فَتُقُبِّلَ مِنْ اَحَدِهِمَا وَلَمْ يُتَقَبَّلْ مِنَ الْاٰخَرِ} “तो उनमें से एक की क़ुर्बानी क़ुबूल कर ली गयी, जबकि दूसरे की क़ुबूल नहीं की गयी।”
            आदम अलै० के यह दो बेटे हाबील व क़ाबील थे। हाबील भेड़-बकरियाँ चराता था और क़ाबील काश्तकार था। उन दोनों ने अल्लाह के हुज़ूर क़ुर्बानी दी। हाबील ने कुछ जानवर पेश किये, जबकि क़ाबील ने अनाज नज़र किया। हाबील की क़ुर्बानी क़ुबूल हो गयी मगर क़ाबील की क़ुबूल नहीं हुई। उस ज़माने में क़ुर्बानी की क़ुबूलियत की अलामत यह होती थी कि आसमान से एक शोला नीचे उतरता था और वह क़ुर्बानी की चीज़ को जला कर भस्म कर देता था। इसका मतलब यह था कि अल्लाह ने क़ुर्बानी को क़ुबूल फ़रमा लिया।
            {قَالَ لَاَقْتُلَنَّكَ  ۭ } “उसने कहा मैं तुम्हें क़त्ल करके रहूँगा।”
            क़ाबील ने, जिसकी क़ुर्बानी क़ुबूल नहीं हुई थी, हसद की आग में जल कर अपने भाई हाबील से कहा कि मैं तुम्हें ज़िन्दा नहीं छोडूँगा।
            {اِنَّمَا يَتَقَبَّلُ اللّٰهُ مِنَ الْمُتَّقِيْنَ     27؀} “उसने जवाब दिया कि अल्लाह तो परहेज़गारों ही से क़ुबूल करता है।”
            हाबील ने कहा भाई जान, इसमें मेरा क्या क़ुसूर है? यह तो अल्लाह तआला का क़ायदा है कि वह सिर्फ़ अपने मुत्तक़ी बन्दों की क़ुर्बानी क़ुबूल करता है।

आयत 28 {لَىِٕنْۢ بَسَطْتَّ اِلَيَّ يَدَكَ لِتَقْتُلَنِيْ} “अगर आप अपना हाथ चलाएँगे मुझ पर मुझे क़त्ल करने के लिये”
            {مَآ اَنَا بِبَاسِطٍ يَّدِيَ اِلَيْكَ لِاَقْتُلَكَ ۚ} “(तब भी) मैं अपना हाथ नहीं चलाऊँगा आपको क़त्ल करने के लिये।”
            यानि अगर ऐसा हुआ तो यह एक तरफ़ा क़त्ल ही होगा।
            {اِنِّىْٓ اَخَافُ اللّٰهَ رَبَّ الْعٰلَمِيْنَ     28؀} “मुझे तो अल्लाह का खौफ़ है जो तमाम जहानों का परवरदिगार है।”

आयत 29 {اِنِّىْٓ اُرِيْدُ اَنْ تَبُوْۗاَ بِاِثْمِيْ وَاِثْمِكَ} “मैं चाहता हूँ कि मेरा और अपना गुनाह तुम्ही अपने सर लो”
            {فَتَكُوْنَ مِنْ اَصْحٰبِ النَّارِ ۚ } “तो फिर तुम हो जाओगे जहन्नम वालों में से।”
            अगर आप इस इन्तहा तक पहुँच जाएँगे कि मुझे क़त्ल कर ही देंगे तो आप अपने गुनाहों के साथ-साथ मेरी खताओं का बोझ भी अपने सर उठा लेंगे। एक बेगुनाह इन्सान को क़त्ल करने वाला गोया मक़तूल के तमाम गुनाहों का बोझ भी अपने सर उठा लेता है। यानि अगर आप मुझे नाहक़ क़त्ल करेंगे तो मेरे गुनाहों का वबाल भी आपके सर होगा और मेरे लिये तो यह कोई घाटे का सौदा नहीं है। अलबत्ता इस जुर्म की वजह से आप जहन्नमी हो जाएँगे।
            {وَذٰلِكَ جَزٰۗؤُ ا الظّٰلِمِيْنَ     29؀ۚ} “और यही बदला है ज़ालिमों का।”

आयत 30 {فَطَوَّعَتْ لَهٗ نَفْسُهٗ قَتْلَ اَخِيْهِ } “बिलआखिर उसके नफ्स ने आमादा कर ही लिया उसे अपने भाई के क़त्ल क़त्ल पर”
            इन अल्फ़ाज़ के बैनल सुतूर उसके ज़मीर की कश-मकश का मुकम्मल नक़्शा मौजूद है। एक तरफ अल्लाह का खौफ़, नेकी का जज़्बा, खून का रिश्ता और दूसरी तरफ़ शैतानी तरगीब, हसद की आग और नफ्सानी ख्वाहिश की उकसाहट। और फिर बिलआखिर इस अन्दरूनी कश-मकश में उसका नफ्स जीत ही गया।
            {فَقَتَلَهٗ فَاَصْبَحَ مِنَ الْخٰسِرِيْنَ     30؀} “तो उसने उसे क़त्ल कर दिया और हो गया तबाह होने वालों में से।”

आयत 31 {فَبَعَثَ اللّٰهُ غُرَابًا يَّبْحَثُ فِي الْاَرْضِ} “तो अल्लाह ने एक कव्वा भेजा जो ज़मीन कुरेदने लगा”
            यह पहला खून था जो नस्ले आदम में हुआ। क़ाबील ने हाबील को क़त्ल तो कर दिया लेकिन अब उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि भाई की लाश का क्या करे, उसे कैसे dispose off करे, तो अल्लाह तआला ने एक कव्वे को भेज दिया जो उसके सामने अपनी चोंच से ज़मीन खोदने लगा।
            {لِيُرِيَهٗ كَيْفَ يُوَارِيْ سَوْءَةَ اَخِيْهِ  ۭ } “ताकि (अल्लाह) उसे दिखा दे  कि अपने भाई की लाश को कैसे छुपाये।”
            कव्वे के ज़मीन खोदने के अमल से उसे समझ आ जाये कि ज़मीन खोद कर लाश को दफ़न किया जा सकता है।
            {قَالَ يٰوَيْلَتٰٓى اَعَجَزْتُ اَنْ اَكُوْنَ مِثْلَ هٰذَا الْغُرَابِ فَاُوَارِيَ سَوْءَةَ اَخِيْ ۚ } “(यह देखा तो) उसने कहा हाय मेरी शामत! मैं इस कव्वे जैसा भी ना हो सका कि अपने भाई की लाश को छुपा देता।”
            अफ़सोस मुझ पर! क्या मेरे अन्दर इस कव्वे जैसी अक़्ल भी ना थी कि यह तरीक़ा मुझे खुद ही सूझ जाता।
            {فَاَصْبَحَ مِنَ النّٰدِمِيْنَ      31۝ٺ} “फिर वह बहुत पशेमान हुआ।”
            इस अहसास पर उसके अन्दर बड़ी शदीद नदामत पैदा हुई।


Translated from Bayanul Quran Book. Page 129-130

Find Original Book in Urdu here:
http://data2.tanzeem.info/BOOKS/1_-_Quran-e-Hakeem_aur_Hamari_Zindagi/BU-1-14-Bayan-ul-Quran-2.pdf

Tuesday, July 12, 2016

क़ुरान के बारे में हमारा अक़ीदा Part 2 of 2

(2)   क़ुरान का रसूल अल्लाह पर नुज़ूल
क़ुरान मजीद के मुहम्मद रसूल अल्लाह पर नुज़ूल के ज़िमन (बारे) में भी चन्द बातें नोट कर लें। पहली बहस तो “नुज़ूल” की लग़्वी बहस से मुताल्लिक़ है। यह लफ़्ज़ نَزَلَ,  یَنْزِلُसलासी मुजर्रद में भी आता है। तब यह फेअल लाज़िम होता है, यानि “ख़ुद उतरना।” क़ुरान मजीद के लिये इन मायनों में यह लफ़्ज़ क़ुरान में मुताददिद (कईं) बार आया है। मसलन: {} (बनी इस्राइल:105) “हमने इस क़ुरान को हक़ के साथ नाज़िल किया है और यह हक़ के साथ नाज़िल हुआ है।” यहाँ यह  फ़ेअल लाज़िम रहा है, यानि नाज़िल हुआ। आम तौर पर फ़ेअल लाज़िम को मुताददी बनाने के लिये इस फ़ेअल के साथ किसी सिला (preposition) का इज़ाफा किया जाता है। चुनाँचे यह फ़ेअल نَزَلَبِ के साथ मुताददी होकर भी क़ुरान मजीद में आया है, बमायने उसने उतारा, जैसे جَاءَ “वह आया” से جَاءَ بِہ “वह लाया।” मसलन {نَزَلَ بِهِ  الرُّوْحُ الْاَمِيْنُ       ١٩٣؀ۙ } {...عَلٰي قَلْبِكَ} यानि रूहुल अमीन (जिब्रील) ने इस क़ुरान को उतारा है मुहम्मद के क़ल्बे मुबारक पर।

नुज़ूले क़ुरान की दो कैफ़ियतें : इन्ज़ाल और तन्ज़ील
सलासी मज़ीद फ़ीह के दो अबवाब यानि बाबे इफ्आल और बाबे तफ़्ईल से यह लफ़्ज़ क़ुरान मजीद में बकसरत इस्तेमाल हुआ है। दोनों अबवाब से यह फ़ेअल मुमताददी के तौर पर बमायने “उतारना” इस्तेमाल होता है, यानि اَنْزَلَ, یُنْزِلُ, اِنْزَالًا और نَزَّلَ, یُنَزِّلُ, تَنْزِیلًا। इन दोनों के माबैन फ़र्क यह है कि बाबे इफ़्आल में कोई फ़ेल दफ्फ़तन और एकदम कर देने के मायने होते हैं जबकि बाबे तफ्ईल में वही फ़ेल तदरीजन, अहतमाम, तवज्जोह और मेहनत के साथ करने के मायने होते हैं। इन दोनों के माबैन फ़र्क़ को “ईलाम” और “तालीम” के मायने के फर्क़ के हवाले से बहुत ही नुमाया तौर पर और जामियत के साथ समझा जा सकता है। اِعلام के मायने हैं बता देना। यानि आपने कोई चीज़ पूछी तो जवाब दे दिया गया। चुनाँचे “Information Office” को अरबी में “मकतबुल ईलाम” कहा जाता है। जबकि “तालीम” के मायने ज़हन नशीन कराना और थोड़ा-थोड़ा करके बताना है। यानि पहले एक बात समझा देना, फिर दूसरी बात उसके बाद बताना और इस तरह दर्जा-ब-दर्जा मुख़ातब के फ़हम की सतह बुलंद से बुलंदतर करना।
अग़रचे क़ुरान मजीद के लिये लफ़्ज़ “इन्ज़ाल” और उससे मुशतक़ मुख़्तलिफ़ अल्फ़ाज़ इस्तेमाल हुए हैं, लेकिन बकसरत (ज़्यादातर) लफ़्ज़ “तन्ज़ील” इस्तेमाल हुआ है। क़ुरान मजीद की असल शान तन्ज़ीली शान है, यानि यह कि इसको तदरीजन, रफ़्ता-रफ़्ता, थोड़ा-थोड़ा और नजमन-नजमन नाज़िल किया गया। चुनाँचे क़ुरान मजीद के हुज़ूर पर नुज़ूल के लिये सहीतर और ज़्यादा मुस्तमिल लफ़्ज़ क़ुरान हकीम में तन्ज़ील है, ताहम दो मक़ामात पर “لَیْلَۃُ الْقَدْرِ” और “لِیْلَۃٌ مُّبَارَکَۃٌ” के साथ इन्ज़ाल का लफ़्ज़ आया है। फ़रमाया: {اِنَّآ اَنْزَلْنٰهُ فِيْ لَيْلَةِ الْقَدْرِ} (अल कद्र:1) और: {اِنَّآ اَنْزَلْنٰهُ فِيْ لَيْلَةٍ مُّبٰرَكَةٍ } (अल दुख़ान 3) इसी तरह {شَهْرُ رَمَضَانَ الَّذِيْٓ اُنْزِلَ فِيْهِ الْقُرْاٰنُ} (अल बक़रह:185) में भी लफ़्ज़ “इन्ज़ाल” इस्तेमाल हुआ है। फिर हुज़ूर पर नुज़ूल के लिये भी कहीं-कहीं लफ़्ज़ “इन्ज़ाल” आया है, अग़रचे अकसर बेशतर लफ्ज़ “तन्ज़ील” ही आया है। इसकी तक़रीबन मज्मुआ अलय तावील यह है कि पूरा क़ुरान दफ्फ़तन लौहे महफ़ूज़ से समाये दुनिया तक लैललतुल क़द्र में नाज़िल कर दिया गया, जिसे “लैलाह मुबारका” भी कहा गया है जो कि रमज़ानुल मुबारक की एक रात है। लिहाज़ा जब रमज़ानुल मुबारक की लैललतुल क़द्र या लैलाह मुबारक में क़ुरान के नुज़ूल का ज़िक्र हुआ तो लफ़्ज़ इन्ज़ाल इस्तेमाल हुआ। क़ुरान मजीद समाये दुनिया पर एक ही बार मुकम्मल पूरे तौर पर नाज़िल होने के बाद वहाँ से तदरीजन और थोड़ा-थोड़ा करके मुहम्मद रसूल पर नाज़िल हुआ। लिहाज़ा हुज़ूर पर नुज़ूल के लिये अकसर बेशतर लफ़्ज़ तन्ज़ील इस्तेमाल हुआ है।
लफ़्ज़ तन्ज़ील के (ज़िमन) बारे में सूरतुल निशा की आयत 136 निहायत अहम है। इर्शाद हुआ:
{يٰٓاَيُّھَا الَّذِيْنَ اٰمَنُوْٓا اٰمِنُوْا بِاللّٰهِ وَرَسُوْلِهٖ وَالْكِتٰبِ الَّذِيْ نَزَّلَ عَلٰي رَسُوْلِهٖ وَالْكِتٰبِ الَّذِيْٓ اَنْزَلَ مِنْ قَبْلُ ۭ}
“ऐ ईमान वालो! ईमान लाओ (जैसा कि ईमान लाने का हक़ है) अल्लाह पर और उसके रसूल पर और उस किताब पर भी जो उसने अपने रसूल पर नाज़िल फ़रमाई और उस किताब पर भी जो उसने पहले नाज़िल की।”
तौरात तख़्तियों पर लिखी हुई, मकतूब शक्ल में हज़रत मूसा अलै० को दी गई थी। वह चूँकि दफ्फ़तन और जुमलतन वाहिदतन (एक बार में पूरी) दे दी गई, इसलिये इसके लिये लफ़्ज़ इन्ज़ाल आया है, जबकि क़ुरान थोड़ा-थोड़ा करके बाइस-तेईस बरस में नाज़िल हुआ। लिहाज़ा इसी के ज़िमन में लफ़्ज़ “नज़्ज़ला” इस्तमाल हुआ। चुनाँचे ऊपर वाली आयत हैं “तन्ज़ील” और “इन्ज़ाल” एक-दूसरे के बिल्कुल मुक़ाबले में आये हैं। गोया यहाँ تُعْرَفُ الْاشْیَاءُ بِاَضْدَادِھَا” (चीज़ें अपनी अज़्दाद से पहचानी जाती हैं) का उसूल दुरुस्त बैठता है।

हिकमते तन्ज़ील
अब हम यह जानने कि कोशिश करते हैं कि तन्ज़ील की हिकमत क्या है? यह थोड़ा-थोड़ा करके क्यों नाज़िल किया गया और एक ही बार क्यों ना नाज़िल कर दिया गया? क़ुरान मजीद में इसकी दो हिकमतें बयान हुई हैं।
एक तो यह कि लोग शायद इसका तहम्मुल (बरदाशत) ना कर सकते। चुनाँचे लोगों के तहम्मुल की ख़ातिर थोड़ा-थोड़ा करके नाज़िल किया गया ताकि वह इसको अच्छी तरह समझें, इस पर गौर करें और इसे हरज़े जान बनाएँ और इसी के मुताबिक़ उनके ज़हन फ़िक्र की सतह बुलंद हो। यह हिकमत सूरह बनी इस्राइल की आयत 106 में बयान की गई है:
{وَقُرْاٰنًا فَرَقْنٰهُ لِتَقْرَاَهٗ عَلَي النَّاسِ عَلٰي مُكْثٍ وَّنَزَّلْنٰهُ تَنْزِيْلًا   ١٠٦؁}
“और हमने क़ुरान को टुकड़ों-टुकड़ों में मुन्क़सिम कर दिया ताकि आप थोड़ा-थोड़ा करके और वक़्फे-वक़्फे से लोगों को सुनाते रहें और हमने इसे बतदरीज उतारा।”
इस हिकमत को समझने के लिये बारिश की मिसाल मुलाहिज़ा कीजिये। बारिश अगर एकदम बहुत मूसलाधार हो तो उसमें वह बरकात नहीं होती जो थोड़ी-थोड़ी और तदरीजन होने वाली बारिश में होती है। बारिश अगर तदरीजन हो तो ज़मीन के अंदर जज़्ब होती चली जायेगी, लेकिन अगर मूसलाधार बारिश हो रही हो तो उसका अक्सर व बेशतर हिस्सा बहता चला जायेगा। यही मामला क़ुरान मजीद के इन्ज़ाल तन्ज़ील का है। इसमें लोगों की मसलहत है कि क़ुरान उनके फ़हम में, उनके बातिन में, उनकी शख़्सियतों में तदरीजन सरायत करता चला जाये। सरायत के हवाले से मुझे फिर अल्लामा इक़बाल का शेर याद आया है:
चूँ बजाँ दर रफ़त जाँ दीग़र शूद
जान चूँ दीगर शद जहाँ दीगर शूद!
“(यह क़ुरान) जब किसी के बातिन में सराहत कर जाता है तो उसके अंदर एक इन्क़लाब बरपा हो जाता है, और जब किसी के अंदर की दुनिया बदल जाती है तो उसके लिये पूरी दुनिया ही इन्क़लाब की ज़द में जाती है!”
तो जब यह क़ुरान किसी के अंदर इस तरह उतर जाता है जैसे बारिश का पानी ज़मीन में जज़्ब होता है तो उसकी शख़्सियत में सराहत कर जाता है और उसके सराहत करने के लिये उसका तदरीजन थोड़ा-थोड़ा नाज़िल किया जाना ही हिकमत पर बनी है। लेकिन इससे भी ज़्यादा अहम बात सूरतुल फ़ुरक़ान में कही गयी है, इसलिये कि वहाँ कुफ़्फ़ारे मक्का बिल् ख़ुसूस सरदाराने क़ुरैश का बाक़ायदा एक ऐतराज़ नक़ल हुआ है। फ़रमाया:
{وَقَالَ الَّذِيْنَ كَفَرُوْا لَوْلَا نُزِّلَ عَلَيْهِ الْقُرْاٰنُ جُمْلَةً وَّاحِدَةً   ڔ كَذٰلِكَ   ڔ لِنُثَبِّتَ بِهٖ فُؤَادَكَ وَرَتَّلْنٰهُ تَرْتِيْلًا       32؀} {وَلَا يَاْتُوْنَكَ بِمَثَلٍ اِلَّا جِئْنٰكَ بِالْحَقِّ وَاَحْسَنَ تَفْسِيْرًا       33؀ۭ}
“मुन्करीन कहते हैं: इस शख़्स पर सारा क़ुरान एक ही वक़्त में क्यों उतार दिया गया? हाँ ऐसा इसलिये किया गया है कि इसको हम अच्छी तरह आप () के ज़हेननशीन करते रहें और इसको हमने बग़रज़े तरतील थोड़ा-थोड़ा करके उतारा है। और (इसमें यह मस्लिहत भी है कि) जब कभी वह आपके सामने कोई निराली बात (या अजीब सवाल) लेकर आये, उसका ठीक जवाब बर वक़्त हमने आपको दे दिया और बेहतरीन तरीके से बात खोल दी।”
ऐतराज़ यह था कि यह पूरा क़ुरान एकदम, एक बारगी क्यों नहीं नाज़िल दर दिया गया? इस ऐतराज़ में जो वज़न था, पहले इसको समझ लिजिये। उन्होंने जो बात की दर हक़ीक़त उससे मुराद यह थी कि जैसे हमारा एक शायर दफ्फ़तन पूरा दीवान लोगों को फ़राहम नहीं कर देता, बल्कि वह एक ग़ज़ल कहता है, क़सीदा कहता है, फिर मज़ीद मेहनत करता है, फिर कुछ और तबा आज़माई करता है, फिर कुछ और कहता है, इस तरह तदरीजन दीवान बन जाता है, इसी तरीके से मुहम्मद () कर रहे हैं। अगर यह अल्लाह का कलाम होता तो पूरा का पूरा एकदम नाज़िल हो सकता था। यह तो दर हक़ीक़त इंसान की कैफ़ियत है कि पूरी किताब दफ्फ़तन produce नहीं कर देता। पूरा दीवान तो किसी शायर ने एक दिन के अंदर नहीं कहा बल्कि उसे वक़्त लगता है, वह मुसलसल मेहनत करता है, कुछ तकल्लुफ़ भी करता है, कभी आमद भी हो जाती है, लेकिन वह कलाम दीवान की शक़्ल में तदरीजन मदव्वन होता है। तो यह तो इसी तरह की चीज़ है। { لَوْلَا نُزِّلَ عَلَيْهِ الْقُرْاٰنُ جُمْلَةً وَّاحِدَةً   ڔ } “क्यों नहीं यह क़ुरान इस पर एकदम नाज़िल हो गया?”
अब इसका जवाब दिया गया: { كَذٰلِكَ   ڔ لِنُثَبِّتَ بِهٖ فُؤَادَكَ} “यह इसलिये किया है ताकि नबी हम इसके ज़रिये से आपके दिल को तस्बीत (जमाव) अता करें।” यानि वह बात जो आम इंसानों की मस्लिहत में है वह ख़ुद मुहम्मद रसूल अल्लाह के लिये भी मस्लिहत पर मब्नी है कि आपके लिये भी शायद क़ुरान मजीद का एकबारग़ी तहम्मुल करना मुश्किल हो जाता। सूरतुल हश्र के आखिरी रुकू में यह अल्फ़ाज़ वारिद हुए हैं: { لَوْ اَنْزَلْنَا هٰذَا الْقُرْاٰنَ عَلٰي جَبَلٍ لَّرَاَيْتَهٗ خَاشِعًا مُّتَصَدِّعًا مِّنْ خَشْيَةِ اللّٰهِ  ۭ } (आयत:21) “अगर हम पूरे के पूरे क़ुरान को दफ्फ़तन किसी पहाड़ पर नाज़िल कर देते तो तुम देखते कि वह अल्लाह के ख़ौफ से दब जाता और फट जाता।” (नोट कीजिये कि यहाँ लफ़्ज़ “इन्ज़ाल” आया है)। मालूम हुआ कि क़ल्बे मुहम्मदी को जमाव और ठहराव अता करने के लिये इसे बतदरीज नाज़िल किया गया है: { وَرَتَّلْنٰهُ تَرْتِيْلًا  } “और हमने इसको बग़रज़े तरतील थो़ड़ा-थोड़ा करके उतारा है।” “रतल” छोटे पैमाने को, छोटे-छोटे टुकड़े करने को कहते हैं।
अगली आयत में जो इर्शाद हुआ उसके दोनों मफ़हूम हो सकते हैं। एक यह कि नबी! जो ऐतराज़ भी यह हम पर करेंगे हम उसका बेहतरीन जवाब आपको अता कर देंगे। लेकिन दूसरा मफ़हूम यह भी है कि यह एक मुसलसल कशाकश है जो आपके और मुश्रीकीने अरब के दरमियान चल रही है। आज वह एक बात कहते हैं, अगर उसी वक़्त उसका जवाब दिया जाये तो वह दर हक़ीक़त आपकी दावत के लिये मौज़ूं हैं। अगर यह सारे का सारा कलामे इलाही एक ही मर्तबा नाज़िल हो जाता तो हालात के साथ उसकी मुताबिक़त और उनकी तरफ से पेश होने वाले ऐतराज़ात का बर वक़्त जवाब होता और इसके अंदर जो असर अंदाज़ होने की कैफ़ियत है वह हासिल होती। इस तदरीज में अपनी जगह मौज़ूनियत है और उसकी अपनी तासीर है। इस ऐतबार से क़ुरान मजीद को तदरीजन नाज़िल किया गया।

क़ुरान करीम का ज़माना-ए-नुज़ूल और अर्ज़े नुज़ूल
रसूल अल्लाह पर क़ुरान करीम के नुज़ूल के ज़िमन में अब दो छोटी-छोटी चीज़ें और नोट कर लीजिये। यह सिर्फ मालूमात के ज़िमन में हैं। इसका ज़माना नुज़ूल क्या है? हम जिस हिसाब (सन् ईसवी) से बात करने के आदी हैं, उसी हिसाब से हमारे ज़हन का सुग़रा-कबरा बना हुआ है। इस ऐतबार से नोट कर लीजिये कि क़ुरान हकीम का ज़माना-ए-नुज़ूल 610 ई० से 632 ई० तक 22 बरस पर मुश्तमिल है। क़मरी हिसाब से यह 23 बरस बनेंगे। 40 आमुल फ़ील से शुरू करें तो 12 साल क़ब्ले हिजरत और 11 हिजरी साल मिलकर 23 साल क़मरी बनेंगे. जिनके दौरान यह क़ुरान बतर्ज़े तन्ज़ील थोड़ा-थोड़ा करके नाज़िल हुआ। सही हदीसों में यह शहादत मौजूद है कि पहले सूरह अलक़ की पाँच आयतें नाज़िल हुई, फिर तीन साल का वक़्फ़ा आया। सूरह अलक़ की यह पाँच आयात भी चूँकि क़ुरान मजीद का हिस्सा हैं, लिहाज़ा सही क़ौल यही है कि क़ुरान हकीम का ज़माना-ए-नुज़ूल 23 क़मरी या 22 शम्सी साल है।
अब यह कि नुज़ूल की जगह कौनसी है? इस ज़िमन में सिर्फ़ एक लफ़्ज़ नोट कर लीजिये कि तक़रीबन पूरे का पूरा क़ुरान “हिजाज़” में नाज़िल हुआ। इसलिये कि अग़ाज़े वही के बाद हुज़ूर अकरम का कोई सफ़र हिजाज़ से बाहर साबित नहीं है। अग़ाज़े वही से क़ब्ल आप ने मुताददिद सफ़र किये हैं। आप शाम का सफ़र करते थे, यक़ीनन यमन भी आप जाते होंगे। इसलिये कि अल्फ़ाज़े क़ुरानी “رِحْلَةَ الشِّتَاۗءِ وَالصَّيْفِ” की रू से क़ुरैश के सालाना दो सफ़र होते थे। गर्मियों के मौसम में शिमाल की तरफ़ जाते थे, इसलिये कि फ़लस्तीन का इलाक़ा निस्बतन ठंडा है, और सर्दियों के मौसम में वह जुनूब की तरफ़ (यमन) जाते थे, इसलिये कि वह गर्म इलाक़ा है। तो हुज़ूर अकरम ने भी तिजारती सफ़र किये हैं। बाज़ मुहक़्क़ीन ने तो यह इम्कान भी ज़ाहिर किया है कि आप ने उस ज़माने में कोई बेहरी सफ़र भी किया और ग़ल्फ़ को उबूर करके मकरान के साहिल पर किसी जगह आप तशरीफ़ लाये। (वल्लाहु आलम!) यह बात मैंने डाक्टर हमीदुल्लाह साहब के एक लेक्चर में सुनी थी जो उन्होंने हैदराबाद (सिन्ध) में दिया था, लेकिन बाद में इस पर जिरह हुई कि यह बहुत ही कमज़ोर क़ौल है और इसके लिये कोई सनद मौजूद नहीं है। अलबत्ता “अल् ख़बर” जहाँ आज आबाद है वहाँ पर तो हर साल एक बहुत बड़ा तिजारती मेला लगता था और हुज़ूर का वहाँ तक आना साबित है। बहरहाल आपको मालूम है कि हुज़ूर आग़ाज़े वही के बाद दस साल तक तो मक्का मुकर्रमा में रहे, इसके बाद ताईफ़ का सफ़र किया है। फिर आस-पास “अकाज़” का मेला लगता था और मंडियाँ लगती थीं, उनमें आपने सफ़र किये हैं। फिर आप ने मदीना मुनव्वरा हिजरत फ़रमाई। इसके बाद सब जंगें हिजाज़ के इलाक़े ही में हुईं, सिवाये ग़जव-ए-तबूक के। लेकिन तबूक भी असल में हिजाज़ ही का शिमाली सिरा है, इस ऐतबार से हिजाज़ ही का इलाक़ा है जिसमें क़ुरान करीम नाज़िल हुआ था। ताहम दो आयतें इस ऐतबार से मुस्तसना क़रार दी जा सकती हैं कि वह ज़मीन पर नहीं बल्कि आसमान पर नाज़िल हुईं। हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद رضی اللہ عنہ से सही मुस्लिम में रिवायत मौजूद है कि शबे मेराज में अल्लाह तआला ने आप को जो तीन तोहफ़े अता किये उनमें नमाज़ की फ़र्ज़ियत और दो आयाते क़ुरानी शामिल हैं। यह सूरतुल बक़रह की आख़िरी दो आयात हैं जो अर्श के दो ख़जाने हैं जो मुहम्मद रसूल अल्लाह को शबे मेराज में अता हुए। तो यह दो आयतें मुस्तसना हैं कि यह ज़मीन पर नाज़िल नहीं हुईं बल्कि आप को सिद्रतुल मुन्तहा पर दी गयीं और ख़ुद आप सातवें आसमान पर थे, जबकि बाक़ी पूरा क़ुरान आसमान से ज़मीन पर नाज़िल हुआ है। जियोग्राफयाई ऐतबार से हिजाज़ का इलाक़ा महबत वही है।
(3)  क़ुरान हकीम की महफ़ूजियत
मैंने अर्ज़ किया था कि क़ुरान के बारे में तीन बुनियादी और ऐतक़ादी (विश्वासी) चीज़ें हैं: अव्वल, यह अल्लाह का कलाम है दूसरा, यह मुहम्मद रसूल अल्लाह पर नाज़िल हुआ। तीसरा, यह मन व अन कुल का कुल महफ़ूज़ है। इसमें ना कोई कमी हुई है ना कोई बेशी हुई है। ना कमी हो सकती है ना बेशी हो सकती है। ना कोई तहरीफ़ हुई है कोई तब्दीली। यह गोया हमारे अक़ीदे (विश्वास) का जुज़्वे ला यन्फक (वह हिस्सा जो कभी छोड़ा नहीं जा सकता) है। इसमें कुछ इश्तबा (शक) अहले तशय्यो (शिया लोगों) ने पैदा किया है, लेकिन उनकी बात भी मैं कुछ यक़ीन के साथ इसलिये नहीं कह सकता कि उनका यह क़ौल भी सामने आता है कि “हम इस क़ुरान को महफ़ूज़ मानते हैं।” अलबत्ता अवाम में जो चीज़ें मशहूर हैं कि क़ुरान से फ़लाह आयात निकाल दी गईं, फ़लाह सूरत हज़रत अली رضی اللہ عنہ की मदह या शान में थीं, वह इसमें से निकाल दी गई वग़ैरह, उनके बारे में मैं नहीं कह सकता कि यह उनमें से अवाम का ला नाम की बातें हैं या उनके ऐताक़ादात (विश्वास) में शामिल हैं। लेकिन यह कि बहरहाल अहले सुन्नत का इज्माई अक़ीदा (पूरी उम्मत इस पर सहमत) है कि यह क़ुरान हकीम महफ़ूज़ है और कुल का कुल मन अन हमारे सामने मौज़ूद है। इसके लिये ख़ुद क़ुरान मजीद से जो गवाही मिलती है वह सबसे ज़्यादा नुमायां (साफ़) होकर सूरतुल क़ियामा में आई है। फ़रमाया: { اِنَّ عَلَيْنَا جَمْعَهٗ وَقُرْاٰنَه ٗ   17؀ښ  لَا تُحَرِّكْ بِهٖ لِسَانَكَ لِتَعْجَلَ بِهٖ    16؀ۭ} रसूल अल्लाह को अल्लाह तआला ने अज़राहे शफ़्क़त (प्यार से) फ़रमाया: “आप इस क़ुरान को याद करने के लिये अपनी ज़बान को तेजी से हरकत दें। इसको याद करवा देना और पढ़वा देना हमारे ज़िम्मे है।” आप मुशक्क़त (तकलीफ) झेलें, यह ज़िम्मेदारी हमारी है कि हम इसे आप के सीने मुबारक के अंदर जमा कर देंगे और इसकी तरतीब क़ायम कर देंगे, इसको पढ़वा देंगे। जिस तरतीब से यह नाज़िल हो रहा है उसकी ज़्यादा फ़िक्र कीजिये। असल तरतीब जिसमें इसका मुरतब्ब किया जाना हमारे पेश नज़र है, जो तरतीब लौहे महफ़ूज़ की है उसी तरतीब से हम पढ़वा देगें। { ثُمَّ اِنَّ عَلَيْنَا بَيَانَهٗ     19؀ۭ} फिर अग़र आपको किसी चीज़ में इब्हाम महसूस हो और वज़ाहत (समझाने) की ज़रुरत हो तो इसकी तौज़ीह और तद्वीन भी हमारे ज़िम्मे है।
यह सारी ज़िम्मेदारी अल्लाह तआला ने ख़ुद अपने ऊपर ली है। अगर इन आयात को कोई शख्स क़ुरान मजीद की आयात मानता है तो उसको मानना पड़ेगा कि क़ुरान मजीद पूरे का पूरा जमा है, इसका कोई हिस्सा ज़ाया नहीं हुआ। सराहत के साथ यह बात सूरह अल् हिज्र की आयत 9 में मज़कूर है। फरमाया: { اِنَّا نَحْنُ نَزَّلْنَا الذِّكْرَ وَاِنَّا لَهٗ لَحٰفِظُوْنَ} “हमने ही इस “अल् ज़िक्र” को नाज़िल किया है और हम ही इसकी हिफ़ाज़त करने वाले हैं।” यह गोया हमेशा-हमेश के लिये अल्लाह तआला की तरफ़ से गारंटी है कि हमने इसे नाज़िल किया और हम ही इसके मुहाफ़िज़ हैं। इस हक़ीक़त को अल्लामा इक़बाल ने ख़ूबसूरत शेर में बयान किया है:
हर्फ़े रा रैब ने, तब्दील ने
आय इश शर्मिंदा तावील ने
“इसके अल्फ़ाज़ में ना किसी शक व शुबह का शायबा है रद्दो-बदल की गुंजाईश। और इसकी आयत किसी तावील की मोहताज़ नहीं।”
इस शेर में तीन ऐतबारात से नफी की गई है: (1) क़ुरान के हुरूफ़ में यानि इसके मतन में कोई शक़ शुबह की गुंजाइश नहीं। यह मिन अन महफ़ूज़ है। (2) इसमें कहीं कोई तहरीफ़ (परिवर्तन) हुई हो, कहीं तब्दीली की गयी हो, क़तअन ऐसा नहीं। (3) क्या इसकी आयात की उलट-पुलट तावील भी की जा सकती है? नहीं! यह आख़िरी बात बज़ाहिर बहुत बड़ा दावा मालूम होता है, इसलिये कि तावील के ऐतबार से क़ुरान मजीद के मायने में लोगों ने तहरीफ़ की, लेकिन वाक़्या यह है कि क़ुरान मजीद में अगर कहीं माअन्वी तहरीफ़ की कोशिश भी हुई है तो वह क़तअन दर्जा-ए-इस्तनाद को नहीं पहुँच सकी, उसे कभी भी इस्तक़लाल और दवाम हासिल नहीं हो सका, क़ुरान ने ख़ुद उसको रद्द कर दिया। जिस तरह दूध में से मक्ख़ी निकाल कर फेंक दी जाती है, ऐसी ही तावीलात भी उम्मत की तारीख़ के दौरान कहीं भी जड़ नहीं पकड़ सकी है और इसी तरह निकाल दी गई हैं। इस बात की सनद भी क़ुरान में मौजूद है। सूरह हा मीम सजदा की आयत 42 में है: { لَّا يَاْتِيْهِ الْبَاطِلُ مِنْۢ بَيْنِ يَدَيْهِ وَلَا مِنْ خَلْفِهٖ ۭتَنْزِيْلٌ مِّنْ حَكِيْمٍ حَمِيْدٍ } “बातिल इस (क़ुरान) पर हमलावर नहीं हो सकता, ना सामने से ना पीछे से, यह एक हकीम हमीद की नाज़िल करदा चीज़ है।”
यह बात सिरे से ख़ारिज अज़ इम्कान (मुमकिन ही नहीं) है कि इस क़ुरान में कोई तहरीफ़ (परिवर्तन) हो जाये, इसका कोई हिस्सा निकाल दिया जाये, इसमें कोई ग़ैर क़ुरान शामिल कर दिया जाये। सूरतुल हाक़्क़ा की यह आयात मुलाहिज़ा कीजिये जहाँ गोया इस इम्कान की नफ़ी में मुबालगे का अंदाज़ है:
{ وَلَوْ تَقَوَّلَ عَلَيْنَا بَعْضَ الْاَقَاوِيْلِ 44 ؀ۙ} { لَاَخَذْنَا مِنْهُ بِالْيَمِيْنِ   45؀ۙ} { ثُمَّ لَقَطَعْنَا مِنْهُ الْوَتِيْنَ   46؀ڮ} { فَمَا مِنْكُمْ مِّنْ اَحَدٍ عَنْهُ حٰجِـزِيْنَ   47؀}
“(कोई और तो इसमें इज़ाफा क्या करेगा) अगर यह (हमारे नबी मोहम्मद ) ख़ुद भी (बफ़र्ज़े महाल) अपनी तरफ़ से कुछ गढ़ कर इसमें शामिल कर दें तो हम इन्हें दाहिने हाथ से पकड़ेंगे और इनकी शह रग़ काट देंगे। फिर तुम में से कोई (बड़े से बड़ा मुहाफ़िज़ मददगार) नहीं होगा कि जो उन्हें हमारी पकड़ से बचा सके।”
यहाँ तो मुहम्मद रसूल अल्लाह के लिये भी इस शिद्दत के साथ नफ़ी कर दी गयी है। कुफ़्फ़ारे मुश्रिकीन की तरफ़ से मुतालबा किया जाता था कि आप इस क़ुरान में कुछ नरमी और लचक दिखायें यह तो बहुत rigid है, बहुत ही uncompromising है, बहरहाल दुनिया में मामलात “कुछ लो कुछ दो” (give and take) से तय होते हैं, लिहाज़ा कुछ आप नरम पड़ें कुछ हम नरम पड़ते हैं। इसके बारे में फ़रमाया: { وَدُّوْا لَوْ تُدْهِنُ فَيُدْهِنُوْنَ} (अल् क़लम, आयत:9) वह तो चाहते हैं कि आप कुछ ढ़ीले हो जायें तो यह भी ढ़ीले हो जायेंगे।” और सूरह यूनुस में इर्शाद हुआ:
{ وَاِذَا تُتْلٰى عَلَيْهِمْ اٰيَاتُنَا بَيِّنٰتٍ  ۙ قَالَ الَّذِيْنَ لَا يَرْجُوْنَ لِقَاۗءَنَا ائْتِ بِقُرْاٰنٍ غَيْرِ ھٰذَآ اَوْ بَدِّلْهُ  ۭ قُلْ مَا يَكُوْنُ لِيْٓ اَنْ اُبَدِّلَهٗ مِنْ تِلْقَاۗئِ نَفْسِيْ  ۚ اِنْ اَتَّبِعُ اِلَّا مَا يُوْحٰٓى اِلَيَّ  ۚ اِنِّىْٓ اَخَافُ اِنْ عَصَيْتُ رَبِّيْ عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيْمٍ    15؀}
जब उन्हें हमारी आयाते बय्यिनात सुनाई जाती हैं तो वह लोग जो हमसे मिलने की तवक़्क़ो नहीं रखते, कहते हैं कि इस क़ुरान के बजाये कोई और क़ुरान लायें या इसमें कुछ तरमीम कीजिये। (ऐ नबी!इनसे) कह दीजिए मेरे लिये हर्ग़िज़ मुमकिन नहीं है कि मैं अपने ख़्याल और इरादे से इसके अंदर कुछ तब्दीली कर सकूँ। मैं तो ख़ुद पाबंद हूँ उसका जो मुझ पर वही किया जाता है। अगर मैं अपने रब की नाफ़रमानी करुँ तो मुझे एक बड़े हौलनाक दिन के अज़ाब का डर है।”
यह है क़ुरान मजीद की शान कि यह लफ़्जन, मायनन, मतनन कुल्ली तौर पर (हर तरह से) महफ़ूज़ है।

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Translated from Bayanul Quran Book. Page 8-11